पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (२७१) "गृहमध्यनिखातेन धनेन धनिनो यदि । भवाम किं न तेनैव धनेन धनिनो वयम् ॥ १६९ ॥ "घरमे गाडे हुए धनस ही यदि धनवान् धनी हो तो उसी धनसे हम क्यों न धनी गिने जायें ? ॥ १६९ ॥ तथाच- तैसेही- उपार्जितानामर्थानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥ १७० ॥ उपार्जन किये धनोंका त्याग ही रक्षा है जैसे सरोवरके मध्यमे स्थित जलोंका निकलना ॥ १७० ॥ दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्त्तव्यः । पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये ॥ १७१ ॥ देना चाहिये, भोगना चाहिये, परन्तु धनका संचय न करना देखो मधुम- क्खियोंका सञ्चित शहद अन्य जन हरण करते हैं ॥ १७१ ॥ अन्यच्च- औरभी- दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥१७२॥ दान, भोग और नाश यह धनकी तीन गति होती हैं जो न देता न खाता है उसकी तीसरी गति (धनका नाश) होती है ॥ १७२ ॥ एवं ज्ञात्वा विवेकिना न स्थित्यर्थं वित्तोपार्जनं कर्त्तव्यं यतो दुःखाय तत् । उक्तञ्च- ऐसा जानकर ज्ञानियोंको जोडनेके निमित्त धन उपार्जन करना न चाहिये जिससे कि वह दु खके निमित्त होताहै। कहाहै- धनादिकेषु विद्यन्ते येऽत्र मूर्खाः सुखाशयाः । तप्तग्रीष्मेण सेवन्ते शैत्यार्थं ते हुताशनम् ॥ १६३ ॥ सुखकी आशासे जो महामूर्ख धनादिमे विद्यमान रहतेहैं, वे तप्त गरमीसे आर्तहुए शीतके निमित्त अग्निकी खोज करतेहैं ॥ १६३ ॥