पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (२९७) अज्ञातविविधासारतोयशस्यो व्रजेत्तु यः । परराष्ट्रं स नो भूयः स्वराष्ट्रर्माधगच्छति ॥ ३९ ॥ सुहृद्दल, जल, खेती इनको बिना जाने जो परपुरुषके राज्यमें चढ जाता है वह फिर अपने राज्यमें नहीं आता है ॥ ३९ ॥ तत्ते युक्तं कर्तुमपसरणम् । सो तुम्हारा यहासे पयानही करना युक्त है । अन्यच्च- औरभी- न विग्रहं न सन्धानं बलिना तेन पापिना । कार्यलाभमपेक्ष्यापसरणं क्रियते बुधैः ॥ ४० ॥ उस पापी बलीके संग विग्रह और संधि करनी नहीं चाहिये कार्यके लाभको देखकर पंडितको अपसरण करना चाहिये ॥ ४० ॥ उक्तञ्च यतः- कारण कहा है- यदपसरति मेषः कारणं तत्प्रहर्तुं मृगपतिरपि कोपात्संकुचत्युत्पतिष्णुः । हृदयविहितवैरा गूढमन्त्रोपचाराः किमपि विगणयन्तो बुद्धिमन्तः सहन्ते ॥ ४१ ॥ जो मेष अपसरण करता है इसमें शत्रुको प्रहार करनेकाही कारण है, सिंहभी क्रोधसे जब हाथीके ऊपरको धावमान होता है तब संकुचित होता है, हृदयमें वैर रखनेवाले गूढ मन्त्रके उपचारवाले महात्मा बुद्धिमान् कुछ विचारसेही शत्रुओंके उपद्रव सहन करते हैं ॥ ४१ ॥ अन्यच्च- औरभी- बलवन्तं रिपुं दृष्ट्वा देशत्यागं करोति यः । युधिष्ठिर इवाप्नोति पुनर्जीवन्स मेदिनीम् ॥ ४२ ॥ बलवान् शत्रुको देखकर जो देश त्यागना करता है वह युधिष्ठिरकी समान जीतेहीजी पृथ्वीको प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥