पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in context( २० ) पञ्चतन्त्रम् । नीतिशास्त्र पढते हुए जो सुना है, वह सेवाधर्मका सारभूत हृदयमें स्थापन कर- लिया है उसे सुनो- सुवर्णपुष्पितां पृथ्वीं विचिन्वन्ति नरास्त्रयः । शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ ४६ ॥ विक्रमी, विद्वान् और सेवक सुवर्णके पुष्पवाली पृथ्वीको खोज करतेहैं (प्राप्त करते हैं) ॥ ४६ ॥ सा सेवा या प्रभुहिता ग्राह्या वाक्यविशेषतः । आश्रयेत्पार्थिवं विद्वांस्तद्वारेणैव नान्यथा ॥ ४७ ॥ वही सेवा है, जो प्रभुका हित करनेवाली है, वह प्रभुके वाक्यसे ग्रहणकरी जाती है, विद्वान् पुरुष उस (वाक्य) द्वारसे राजाका आश्रय करे और उपाय नहीं है ॥ ४७ ॥ यो न वेत्ति गुणान्यस्य न तं सेवेत पण्डितः । न हि तस्मात्फलं किंचित्सुकृष्टादूपरादिव ॥ ४८ ॥ जो जिसके गुण न जाने, विद्वान् उसकी सेवा न करें, कारण कि, उससे कुछ फल नहीं होता, जैसे ऊषर भूमिके जोतनेसे ॥ ४८ ॥ द्रव्यप्रकृतिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणान्वितः । भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ४९ ॥ धन और प्रकृतिसे हीन पुरुषभी सेवनीय गुणोंसे युक्त हो तो सेवा करनी चाहिये, उससे आजीवन और कालान्तरसे फलकी प्राप्तिभी होसकती है ॥४९॥ अपि स्थाणुवदासीनः शुष्यन्परिगतः क्षुधा । न त्वेवानात्मसम्पन्नाद्वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ ५० ॥ ठूंठकी समान स्थित हुआ सूखता हुआ महाभूखसे स्थित रहना (अच्छा) है परन्तु चतुर पुरुष ज्ञानशून्य प्रभुसे वृत्तिप्राप्त होनेकी इच्छा न करै ॥ ५० ॥ सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् । आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥ ५१ ॥ सेवक कृपण स्वामीको कठिन अक्षरोंसे निन्दा करताहै, परन्तु वह अपनी निन्दा क्यों नहीं करता, वह जो सेव्य और असेव्यको नहीं जानता है, (कारण कि यह कृपण है वा नहीं पहले ही वह विचार कर स्वामीकी सेवा करै ) ५१॥