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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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( ३३८ ) पञ्चतन्त्रम् । कर फिर घर आया दूसरे दिन वहां जाय एक दीनार देखकर ग्रहण कर विचारने लगा-"अवश्यही यह वांबी सुवर्णके दीनारसे पूर्ण है। सो इसे मारकर सब‌को एकही बार ग्रहण करूं"। ऐसा विचार दूसरे दिन दूध देते हुए ब्राह्मणपुत्रने सर्पके शिरमें लकडीसे प्रहार किया। वह किसी प्रकार दैववशसे प्राणसे विमुक्त नहोकर रोषसे उसे तीव्र दांतोंसे इस प्रकार काटता हुआ कि वह शीघ्र पंचत्वको प्राप्त हुआ। स्वजनोने थोडीही दूर खेतपे काष्ठ संचय कर संस्कार किया। दूसरे दिन उसका पिता आया। अपने जनोंसे पुत्रके नाशका कारण सुनकर वैसाही समर्थन करता हुआ। बोला भी- "भूतान्यो नानुगृह्णाति ह्यात्मनः शरणागतान् । भूतार्थास्तस्य नश्यन्ति हंसाः पद्मवने यथा ॥ १३६ ॥" जो प्राणियोंपर अनुग्रह नहीं करता और जो अपने शरणमे आये हैं उनको नहीं रखता उसके निश्चित अर्थ इस प्रकार नष्ट होजाते हैं जैसे पद्मवनमें हंस १३६ पुरुषैरुक्तम्- "कथमेतत् ?" ब्राह्मणः कथयति- पुरुषोने कहा- "यह कैसे ?" ब्राह्मण कहने लगा- कथा ६. अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने चित्ररथो नाम राजा। तस्य योधैः सुरक्ष्यमाणं पद्मसरो नाम सरस्तिष्ठति। तत्र च प्रभूता जाम्बूनदमया हंसास्तिष्ठन्ति। षण्मासे षण्मासे पिच्छमेकैकं - परित्यजन्ति। अथ तत्र सरसि सौवर्णो बृहत् पक्षी समा- यातः तैश्चोक्तः- "अस्माकं मध्ये त्वया न वस्तव्यम्। येन का- रणेन अस्माभिः षण्मासान्ते पिच्छैकैकदानं कृत्वा गृहीतमे- तत्सरः" । एवं च किं बहुना परस्परं द्वैधमुत्पन्नम्। स च राज्ञः शरणं गतोऽब्रवीत्- "देव ! एते पक्षिण एवं वदन्ति- “यत् अस्माकं राजा किं करिष्यति ? न कस्यापि आवासं दद्मः” । मया च उक्तं,- "न शोभनं युष्माभिः अभिहितम् । अहं गत्वा राज्ञे निवेदयिष्यामि। एवं स्थिते देवः प्रमाणम्” ततो राजा भृत्यान् अब्रवीत्,- "भो भो ! गच्छत, सर्वान्