पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( ३४३ ) पतिव्रता पतिकी प्राण पतिके प्रिय और हितमे तत्पर जिसके ऐसी भार्या है वह पुरुष पृथ्वीमें धन्य है ॥ १९१ ॥ न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते । गृहं हि गृहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥ १९२ ॥ घरका नाम घर नहीं किन्तु स्त्रीका नाम गृह है, गृहिणीके विना घर वनकी समान है ॥ १९२ ॥ पञ्जरस्था ततः श्रुत्वा भर्तुर्दुःखान्वितं वचः । कपोतिका सुसन्तुष्टा वाक्यञ्चेदमथाह सा ॥ १९३ ॥ तब पींजरेमें स्थित हुई कबूतरी उसके दुःखभरे वचन सुनकर इस प्रकार सन्तुष्ट होकर कहने लगी ॥ १९३ ॥ न सा स्त्रीत्यभिमन्तव्या यस्यां भर्त्ता न तुष्यति । तुष्टे भर्त्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ १९४ ॥ उसमें स्त्रीपन मत मानो जिससे कि स्वामी प्रसन्न नहीं होता नारियोंके पति प्रसन्न होनेमें सब देवता उसपर प्रसन्न होजाते हैं ॥ १९४ ॥ दावाग्निना विदग्धेव सपुष्पस्तवका लता । भस्मीभवतु सा नारी यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ॥ १९५ ॥ दावाग्निसे दग्ध हुई फल गुच्छेवाली लताकी समान वह स्त्री भस्म होजातीहै जिसपर स्वामी प्रसन्न नहीं होता ॥ १९५ ॥ मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं भर्त्तारं का न पूजयेत् ॥ १९६ ॥ पिता माता पुत्र परिमित सुख देते हैं, इससे अमित दान देनेवाले भर्त्ताका पूजन कौन न करे ॥ १९६ ॥ पुनश्च अब्रवीत्- फिरभी बोली- शृणुष्वावहितः कान्त यत्ते वक्ष्याम्यहं हितम् । प्राणैरपि त्वया नित्यं संरक्ष्यः शरणागतः ॥ १९७ ॥ हे स्वामी ! सावधान होकर सुनो जो मैं तुमको हितकर वचन कहतीहूं शरणमें आया पुरुष प्राणोंसे अधिक रक्षा करना चाहिये ॥ १९७ ॥