पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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[Page Body] सो गुहासे लौटनेपर शत्रु मारनेवाले आपसे सब वृत्तान्त विस्तारपूर्वक व्याकुलतारहित होकर कहूँगा”। तब यह उसका वचन सुन परिजनसहित एक एकजलती बनकी लकडी चोचमें ग्रहण कर उस गुहाके द्वारमें प्राप्त हो स्थिरजी वीके घोंसलेमें डालते हुए । तब वे सब दिनके अन्धे रक्ताक्षके वचनोंको स्मरण करते द्वार रुकनेसे न निकलनेके कारण गुहाके मध्यमें कुम्भीपाककी समान दग्ध होकर मरगये । इस प्रकार शत्रुओंको निःशेष कर फिरभी मेघवर्ण उस न्यग्रोध वृक्षरूपी दुर्गमे प्राप्त हुआ । तब सिंहासनपर स्थित हो सभाके मध्यमें प्रसन्न मन हुआ स्थिरजीवीसे पूछने लगा-“तात ! किसप्रकार तुमने शत्रुओंके मध्यमें जाकर इतना समय बिताया ? सो इसमें हमको कौतुक है । सो कहिये कारण- वरमग्नौ प्रदीप्ते तु प्रपातः पुण्यकर्मणाम् । न चारिजनसंसर्गो मुहूर्त्तमपि सेवितः ॥ २३३ ॥” पुण्यकर्मी पुरुष एक साथ अग्निमें गिरजाना अच्छा जानते हैं परन्तु शत्रुसंग एक मुहूर्त मात्रभी अच्छा नहीं ॥ २३३ ” तत आकर्ण्य स्थिरजीवी आह,-“भद्र ! आगामिफलवा- ञ्छया कष्टमपि सेवको न जानाति । उक्तञ्च यतः- यह सुन स्थिरजीवी बोला-“भद्र ! आनेवाले फलकी आकाक्षासे सेवक कष्टको कुछ नहीं गिनता । कहा है-कारण कि, उपनतभयैर्यो यो मार्गो हितार्थकरो भवे- त्तस निपुणया बुद्ध्या सेव्यो महान्कृपणोऽपि वा । करिकरनिभौ ज्याघातांकौ महार्थविशारदौ रचितवलयैः स्त्रीशृद्वद्धौ करौ हि किरीटिना ॥ २३४ ॥ भयके प्राप्त होनेमें जो जो मार्ग हितकारी होवे, चतुराई बुद्धिसे वह वह मार्ग उत्कृष्ट वा अधमहो सेवन करना चाहिये, जिस कारणसे कि अर्जुनने हाथीकी सूडकी समान ज्याघातके चिन्हवाली विपुल अर्थके साधनमें विख्यात दोनों भुजा स्त्रीकी समान कपटनिर्मित कंकण पहरनेवाली कीर्थी (अज्ञात वास विराटके यहा रहनेके समयकी कथा है हरिणीवृत्त है ) ॥ २३४ ॥ शक्तेनापि सदा नरेन्द्रविदुषा कालान्तरापेक्षिणा वस्तव्यं खलु वाक्यवज्रविषमे क्षुद्रेऽपि पापे जने ।