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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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( ३८२ ) पञ्चतन्त्रम् । धर्मानुसार उसका सम्बन्ध नहीं करना चाहिये तथा सदा उदासीन और अधर्मा- चरणसे दूषित मनुष्यसे अलग रहना चाहिये ॥ २४० ॥ आसने शयने याने पानभोजनवस्तुषु । दृष्टादृष्टप्रमत्तेषु प्रहरन्त्यरयोग्रिरिषु ॥ २४१ ॥ आसन, शयन, यान, पान, भोजनकी वस्तुमें तथा दृष्ट अदृष्टमें प्रमत्त हुए शत्रुमें शत्रु प्रहार करतेहैं ॥ २४१ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन त्रिवर्गानिलयं बुधः । आत्मानमाहतो रक्षेत्प्रमादाद्धि विनश्यति ॥ २४२ ॥ इसकारण पंडित यत्नवान् होकर सब प्रकार धर्म अर्थ कामके आश्रयवाले आत्माकी रक्षाकरे कारण कि असावधानतासे नाश होता है ॥ २४२ ॥ साधु चेदमुच्यते- यह अच्छा कहाहै- सन्तापयन्ति कमपथ्यभुजं न रोगा दुर्मन्त्रिणं कमुपयान्ति न नीतिदोषाः । कं श्रीर्न दर्पयति कं न निहन्ति मृत्युः कं स्त्रीकृता न विषयाः परिपीडयन्ति ॥ २४३ ॥ किस अपथ्य भोजी ( बद परहेजी ) को रोग नहीं सन्ताप देते ? किस कुमं- त्रिको नीतिके दोष प्राप्त नहीं होते? लक्ष्मी किसको दर्प(गर्व) वाला नहीं करती? मृत्यु किसको नहीं मारती? स्त्रीके किये व्यापार किसको पीडित नहीं करते? २४३ लुब्धस्य नश्यति यशः पिशुनस्य मैत्री नष्टक्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः । विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यं राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य ॥ २४४ ॥ लोभीका यश, चुगलकी मित्रता, नष्ट क्रियावालेका कुल, लोभीका धर्म, कामासक्त पुरुषका विद्याफल, कृपणका सुख तथा प्रमत्तमंत्रीवाले राजाका राज्य नष्ट होजाताहै ॥२४४॥ तत् राजन् ! असिधाराव्रतं मया आचारितमरिसंसर्गा- दिति, यद्भवता उक्तं तन्मया साक्षात् एवानुभूतम् । उक्तञ्च-