पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in context(४९२) पञ्चतन्त्रम् । समय तुम अपनी दो भुजा और एक शिर मांग लो जिससे आगे पीछे दो कपडे बुन सकोगे एकके मूल्यसे तौ यथापूर्व घरका खर्च चलेगा । और दूसरेके मूल्यसे विशेष कार्य होंगे, इस प्रकार सुखपूर्वक अपनी जातिके मध्यमें श्लाघित हो समय बीतेगा, और दोनो लोककी प्राप्ति होगी” । वहभी यह सुन प्रसन्न हो बोला-“धन्य पतिव्रता धन्य ! तैने अच्छा कहा । वही करूंगा जो तेरा निश्चय है” । वहभी यह सुनकर व्यन्तरसे मांगता हुआ,-“भो यदि मुझको यथेच्छ वर देता है तो दो भुजा और एक शिर पीछे करदो” । ऐसा कहतेही वह उसी समय दो शिर और चार भुजावाला होगया, सो प्रसन्न होकर जब घर आने लगा तबतक मनुष्योंने राक्षस है यह ऐसा मानकर लकडी पाषाणोके प्रहारसे ताडित किया जिससे वह मरगया । इससे मैं कहता हूं- यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा मित्रोक्तं न करोति यः । स एव निधनं याति यथा मन्थरकौलिकः ॥ ७१ ॥” जिसको स्वयं प्रज्ञा नहीं और मित्रका कहना भी नहीं मानता वह मन्थर कौलिककी समान नष्ट होता है ॥ ७१ ॥” चक्रधरः आह,-“भोः ! सत्यमेतत् । सर्वोऽपि जनोऽश्रद्धे- यामाशापिशाचिकां प्राप्य हास्यपदवीं याति । अथवा साधु इदमुच्यते, केनापि- चक्रधर बोला-“भो ! यह सत्य है सबही मनुष्य श्रद्धाके अयोग्य आशा- रूपी पिशाचिनीको प्राप्त होकर हास्य पदवीको प्राप्त होते हैं, यह किसीने अच्छा कहा है- अनागतवतीं चिन्तामसम्भाव्यां करोति यः । स एव पाण्डुरः शेते सोमशर्मपिता यथा ॥ ७२ ॥” जो होनेके अयोग्य नहीं आई हुईभी चिन्ताको करता है वह सोमशर्माके पिताके समान पाण्डुर होकर शयन करता है ॥ ७२ ॥” सुवर्णसिद्धिः आह,-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्- सुवर्णसिद्धि बोला,-“यह कैसे ?” वह बोला- कथा ९. कस्मिंश्चित् नगरे कश्चित् स्वभावकृपणो नाम ब्राह्मणः प्रतिवसति स्म, तेन भिक्षार्जितैः सक्तुभिः भुक्तशेषैः कलशः