पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( ४५ ) अथ सञ्जीवकसकाशमासाद्य सप्रश्रयमुवाच-“भो मित्र ! प्रार्थितोऽसौ मया भवदर्थे स्वाम्यभयप्रदानम् । तद्विश्रब्ध मा- गम्यतामिति। परं त्वया राजप्रसादमासाद्य मया सह समय- धर्मेण वर्त्तितव्यम् । न गर्वमासाद्य स्वप्रभुतया विचरणीयम् । अहमपि तव संकेतेन सर्वां राज्यधुरममात्यपदवीमाश्रित्य उद्धरिष्यामि। एवं कृते द्वयोरपि आवयोः राज्यलक्ष्मीर्भोग्या भविष्यति । यतः- सञ्जीवकके निकट जाकर नम्रतापूर्वक यह वचन बोला-“हे मित्र ! आपके निमित्त मैंने स्वामीसे अभयदानके लिये प्रार्थना की । सो नि शक होकर चलो परन्तु तुमको राजाका प्रसाद प्राप्त कर, मेरे साथ नियमक्रमसे बर्तना चाहिये, गर्वको प्राप्त होकर अपनी प्रभुतासे न विचरना और मैंभी तुम्हारे संकेतसे सम्पूर्ण राज्यभार अमात्यपदवीको प्राप्त कर धारण करूंगा ऐसा करनेसेही हम दोनोको राज्यलक्ष्मी भोग्य होगी । कारण- आखेटकस्य धर्मेण विभवाः स्युर्वशे नृणाम् । नृप्रजाः प्रेरयत्येको हन्त्यन्योऽत्र मृगानिव ॥ १४० ॥ आखेटके धर्मसे ऐश्वर्य मनुष्योके वशीभूत होजाते हैं, एक मनुष्यरूपी प्रजा- ओको प्रेषण करता है और दूसरा इस संसारमें मृगोंकी समान कार्यसिद्धि करता है ॥ १४० ॥ तथाच- और देखो- यो न पूजयते गर्वादुत्तमाधममध्यमान् । भूपसम्मानमान्योऽपि भ्रश्यते दन्तिलो यथा ॥ १४१ ॥” जो गर्वसे उत्तम, अधम, मध्यमका सन्मान नहीं करता है, वह राजासे सन्मान मान्यताको प्राप्त होकरभी दन्तिलके समान भ्रष्ट होता है ॥ १४१ ॥” सञ्जीवक आह-“कथमेतत् ? ” सोऽब्रवीत- सञ्जीवक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-