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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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भाषाटीकासमेतम् । ( ५९) करटक आह "कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्- करकट बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला- कथा ४. अस्ति कस्मिंश्चिद्विविक्तप्रदेशे मठायतनम् । तत्र देव- शर्मा नाम परिव्राजकः प्रतिवसति स्म । तस्य अनेक- साधुजनदत्तसूक्ष्मवस्त्रविक्रयवशात् कालेन महती वित्त- मात्रा सञ्जाता । ततः स न कस्यचिद्विश्वसिति । नक्त- न्दिनं कक्षान्तरात्तां मात्रां न मुञ्चति । अथवा साधु चे- दमुच्यते- एक किसी निर्जन स्थानमे मठस्थान है वहा देवशर्मा नामक सन्यासी रह- ताथा, उसके पास अनेक महात्मा पुरुषोके दिये सूक्ष्म वस्त्रोके बेचनेसे कुछ समयमें बहुतसा द्रव्य प्राप्त हुआ । तबसे वह किसीका विश्वास नहीं करता रातदिन बगलमेसे उस द्रव्यको नहीं छोडताथा । अथवा किसीने सत्य कहा है- अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानाञ्च रक्षणे । आये दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः ॥ १७४ ॥ अर्थोंके उत्पन्न करनेमें दुःख, अर्जन कियेकी रक्षा करनेमें दुःख, आनेमे दुःख, जानेमें दुःख कष्टके आश्रयवाले अर्थोंको धिक्कार है ॥ १७४ ॥ अथ आषाढभूतिर्नाम परवित्तापहारी धूर्त्तस्तामर्थमात्रां तस्य कक्षान्तरगतां लक्षयित्वा व्यचिन्तयत् । "कथं मया अस्य इयमर्थमात्रा हर्तव्येति । तदत्र मठे तावद्दृढशिला- सञ्चयवशात् भित्तिभेदो न भवति । उच्चैस्तरत्वाच्च द्वारे प्रवेशो न स्यात् । तदेनं मायावचनैर्विश्वास्य अहं छात्रतां व्रजामि येन स विश्वस्तः कदाचिद्विश्वासमेति । उक्तञ्च- उस समय आषाढभूतिनामक पराये धनका हरण करनेवाला धूर्त उस धनको उसकी बगलमें देखकर विचारने लगा- "किस प्रकार मैं यह इसकी धनमात्रा ग्रहण करू । और दृढ पत्थरके बने हुए इस मठमे कूमल नहीं लगसक्ता, ऊंचा अधिक होनेसे द्वारमें प्रवेशभी नहीं होसकता, सो इसको वचनोंसे विश्व-