पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( ६३ ) तं शोचमानो मात्रामुद्दिश्य शनैः शनैः प्रस्थितो यावदाषा- ढभूतिं न पश्यति ततश्च औत्सुक्येन शौचं विधाय यावत् कन्थामालोकयति तावत् मात्रां न पश्यति । ततश्च “हा ! हा ! मुषितोऽस्मीति” जल्पन् पृथिवीतले मूर्च्छया निप- पात । ततः क्षणात् चेतनां लब्ध्वा भूयोऽपि समुत्थाय फूत्कर्त्तुमारब्धः। “भो आषाढभूते ! क्व मां वञ्चयित्वा गतोऽसि । तद्देहि मे प्रतिवचनम्” । एवं बहु विलप्य तस्य पदपद्धतिम- न्वेषयञ्छनैः शनैः प्रस्थितः । अथ एवं गच्छन् सायन्तनसमये कञ्चिद्ग्राममाससाद । अथ तस्माद्ग्रामात्कश्चित्कौलिकः सभा- र्यो मद्यपानकृते समीपवर्त्तिनि नगरे प्रस्थितः । देवशर्मोपि तमालोक्य प्रोवाच--“भो भद्र ! वयं सूर्योढा अतिथयस्त- द्वान्तिकं प्राप्ता न कमपि अत्र ग्रामे जानीमः । तद्गृह्यताम- तिथिधर्मः । उक्तञ्च-- सो तुझ व्रतग्रहणके उपरान्त मठके द्वारे तृणके कुटीमे प्रवेश करना चाहिये”। वह बोला--“भगवन् ! आपकी आज्ञा प्रमाण है दूसरे लोकमे मग लहो यही मेरा प्रयोजन है” सो शयनकी प्रतिज्ञा कर देवशर्मा अनुग्रहकर शास्त्रोक्त विधिसे उसको शिष्य करता भया । वहभी हाथ पैर आदि दाबनेकी परिचर्यासे उसको संतुष्ट करता हुआ, इसपरभी वह मुनि बगलसे मात्राको न त्यागता । तब कुछ समय बीतनेपर आषाढ भूति विचार करनेलगा, “अहो किसीप्रकारसेभी यह मेरे विश्वासको प्राप्त नहीं होताहै। सो क्या दिनमें शस्त्रसे मारू या इसको विषदू या पशुकी समान मारडालू” । यह उसके विचारकरनेपर देवशर्माके शिष्यका पुत्र कोई ग्रामसे निमन्त्रण करनेको आया और बोला-- “भगवन् ! यज्ञोपवीत देनेके निमित्त मेरे घर आइये”। यह सुन देवशर्मा आषाढभूतिके साथ प्रसन्न मन हो चला । तब उनके जातेमें कोई नदी आगे आई । उसको देखकर मात्राको बगलमेंसे निकाल गुदडीमें छिपाय रख स्नान- कर देवार्चनविधिकर आषाढभूतिसे यह बोला--“हे आषाढभूति ! जबतक मैं पुरीष त्यागन करआऊ तबतक यह मुझ योगेश्वरकी गुदडी सावधानतासे रक्षा करना” यह कह गया । आषाढभूतिभी उसके अदर्शन होनेमें उस मात्राको