पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
Page 9 of 536
Read in context(१०) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-
लोट फेर करनेसेही देशका भला और अपनेको कृतकृत्य मानते हैं, कोई चारों- वर्णोंका खान पान एक करके भारतभूमिके सुपुत्र कहलानेकी उत्कट इच्छा करते हैं, कोई फारसी अंग्रेजी पढकर ही समस्त वेदवेदांगका तत्व निरूपणकर देशका भला करनेके साहसी होरहे हैं, इत्यादि जहां देखो जहां सुनो देशसुधार जातिसुधार देशोन्नतिकी पुकार जल वायुकी शुद्धिका विचारही श्रवणगोचर होता है अब इसके फलकी ओर दृष्टि की जाती है तो सर्वथा परिणाम उलटा दृष्टि आता है, मनमें और वचनमें और कार्यमें और है, विदेशियोंकी रीतिपर लेखनी चलीजाती है, खण्डन मण्डनमें पत्र रंग दिये जाते हैं, फल क्या है, कालपडते जाते हैं, महामारीसे देश उजड़े जाते हैं, लोग अल्पायु निर्धन हुए जाते है, जल, वायु बिगड़े जाते है इसी वर्षको विचार लीजिये कि (१९५३, १९५४) वर्षके इस अकालने देशभरमें डामाडोल मचादिया है, असंख्य भार- तवासी भूखे मर गये, देशभर 'दीयताम्' की पुकारसे गूंजउठा है, कितनेही शहर भूखोंने लूटे, कितनीही आत्महत्यां हुई, कितनेही बिके, कितनेही अयोग्य कृत्यमें प्रवृत्त हुए, कितनेही पशुओकी भांति घासपत्तेतक खागये, चौगुने पच- गुने मोल अन्न होगया, लक्षों रुपया सरकारने भी व्यय किया, सनातनधर्माव- लम्बी महात्माओंने सदावर्त जारी किये, दूसरे यूरपदेशोंसे भी लक्षों चन्दा आया, परन्तु महाभूखसे आरत भारतके लिये वह क्या कुछ होसकता है, हमको भूखोंकी जो दशा दृष्टिगोचर हुई कि, जो भूखके मारे प्राण छोडनाही चाहते हैं, जो जंगलमें वृक्षोंके नीचे मरणोन्मुख पड़े हैं, उनके पास कितने जल और अन्न लेकर पहुंचे है, और हो भी क्या जिसके पास स्वयं नहीं वह दूसरेको क्या देगा, श्रावण भादों दोनों महीने साफ उतरगये अग्निमें घृत चढ़ानेपर भी इन्द्रदेवने जल न दिया, इधर तो यह अन्नकष्ट उधर रोगकष्ट भी देखिये भारत- वासी बहुत दिनोंसे विषूचिकासे परिचित हैं, प्रतिवर्ष प्रायः सर्व नगरोंमे हैजेका प्रादुर्भाव होता है, चौवीस घण्टेकी लड़ाईमें बहुधा मनुष्य इससे हारकर कालकवलित होते हैं, परन्तु बहुत दिनोंके परिचित होनेसे इसके नामसेही कम्पित नहीं होते थे, परन्तु इस समय जिस आकरमें (प्लेग) महामारी (ग्रन्थि विसर्प) बम्बईसे प्रगट हुई है उसे सुनकर ही बडे २ धीरजवाले थर्रागये हैं, सहस्रों मनुष्य अचानक इसके उपस्थित होनेमें कालकवलित हुए हैं, ज्वर और ग्रन्थि निकलते ही मनुष्यका प्राण पयान कर जाता है, घरके घर खाली होगये हैं, लक्षों मनुष्य देशान्तरोंको भाग गये हैं, बीमारी भी बम्बईसे आगे चलकर पूना आदि देशोंमें फैल गई है अब भागकर भी कहाँ जाँय, एक ओर 'दीयताम्' और एक ओर 'त्रायस्व' (रक्षाकरो) की ध्वनि फैल रही है। महा-