पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (८१) हुईको देखते भये, तब यह कौलिक उसको देखकर विषसे अर्दित हुएकी समान दुष्टग्रहसे गृहीत हुआसा कामबाणसे ताड़ितकी समान सहसा पृथ्वीमे गिरा । उसकी यह दशा देखकर रथकार उसके दुःखसे दुःखी हुआ, अपने मनुष्योंसे उसको उठवाय अपने घरमें लाया । वहा अनेक प्रकारके शीतल उपचार वैद्योंके किये हुए तथा मंत्रादिसे उपचारको प्राप्त हुआ बहुतकालमे कुछ सचेत भया । तब रथकारने पूंछा-"मित्र ! यह क्या है जो तुम अकस्मात् अचेतन होगये अपनी बात तो कहो ?" । वह बोला,-"मित्र ! जो ऐसा है तो मेरी गुप्त वार्ता सुनो, जिस कारण मैं सब अपना दुःख तुझसे कहताहू । जो तू मुझे अपना सुहृदय मानता है तो चिता रचकर मेरे ऊपर कृपा करो । और क्षमा करना जो कुछ प्रणयके कारण तुमसे अयुक्त कहा होवे" । वहभी यह वचन सुन आंखोंमे आंसू भर गद्गद- कण्ठसे बोला-"मित्र ! जो कुछ दुःखका कारण है, सो कहो जिससे यदि होसके- गा तो उसका प्रतिकार किया जायगा । कहा है- औषधार्थसुमन्त्राणां बुद्धेश्चैव महात्मनाम् । असाध्यं नास्ति लोकेऽत्र यद्ब्रह्माण्डस्य मध्यगम् ॥२१९॥ इस संसार और ब्रह्माण्डके मध्यमें जो कुछभी है वह ओषधी, अर्थ और सुमन्त्र तथा महात्माओंकी बुद्धिके सामने कुछ असाध्य नहीं है॥२१९॥ तदेषां चतुर्णां यदि साध्यं भविष्यति तदा अहं साध- यिष्यामि” । कौलिक आह-“वयस्य ! एतेषामन्येषा- मपि सहस्राणामुपायानामसाध्यं तत् मे दुःखम् । तस्मा- न्मम मरणे मा कालक्षेपं कुरु” । रथकार आह-“भो मित्र ! यद्यपि असाध्यं तथापि निवेदय येनाहमपि तदसाध्यं मत्वा त्वया सह वह्नौ प्रविशामि । न क्षणमपि त्वद्वियोगं सहिष्ये । एष मे निश्चयः” । कौलिक आह-“वयस्य ! या असौ राजकन्या करेणुकारूढा तत्र उत्सवे दृष्टा तस्या दर्शनानन्तरं मकरध्वजेन ममेयमवस्था विहिता । तत न शक्नोमि तद्वेदनां सोढम् । तथाचोक्तम् - सो इन चारोंमे यदि साध्य होगा तो मै साधन करूंगा" । कौलिक बोला,- ६