पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
by महर्षि पराशर
Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)
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Read in context११२ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- ११. एकादशोऽध्यायः अमेध्य-रेतो गोमांसं चाण्डालान्नंमथापि वा । यदि भुक्तं तु विप्रेण कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥ १ ॥ जो ब्राह्मण अपनी इच्छा से किसी प्रकार का अग्राह्य पदार्थ, जैसे— मानव-अस्थि, विष्ठा, मूत्र, वीर्य, रज, शव आदि का भक्षण कर ले अथवा गोमांस या चाण्डाल का अन्न ग्रहण करे, तो उसे शुद्धि के निमित्त चान्द्रायण व्रत करना उचित है । और यदि उपर्युक्त वस्तुएँ किसी के द्वारा बलात् या अनिच्छापूर्वक ग्रहण की गयी हों तो ऐसी अवस्था में कृच्छ्रव्रत करना चाहिए ॥ १ ॥ तथैव क्षत्रियो वैश्योऽप्यर्द्ध चान्द्रायणं चरेत् । शूद्रोऽप्येवं यदा भुङ्क्ते प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ २ ॥ यदि क्षत्रिय या वैश्य कथित वस्तुओं का भक्षण कर ले तो उसे अर्ध-चान्द्रायण व्रत करना पड़ता है । शूद्र के द्वारा ग्रहण किये जाने पर प्राजापत्य नामक व्रत करना उचित है ॥ २ ॥ पञ्चगव्यं पिबेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चं पिबेद् द्विजः । एक-द्वि-त्रि-चतुर्गा वा सद्याद् विप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३ ॥ व्रतकाल में शूद्र को पञ्चगव्य और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णों को ब्रह्मकूर्च का पान करके क्रमशः एक, दो, तीन और चार गायों का दान करने का विधान कहा गया है ॥ ३ ॥ शूद्रान्नं सूतकान्नं च अभोज्यस्याऽन्नमेव च । शङ्कितं प्रतिषिद्धान्नं पूर्वोच्छिष्टं तथैव च ॥ ४ ॥ शूद्र का अन्न, सूतक का अन्न, ग्रहण के समय का अन्न, भक्षण के अयोग्य मनुष्य का अन्न, सन्दिग्ध अन्न अर्थात् जिसके ग्राह्य-अग्राह्य का निर्णय न हो सके, निषिद्ध अन्न और किसी के भक्षण के पश्चात् बचा हुआ जूठा अन्न, ॥ ४ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal