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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

by महर्षि पराशर

Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)

DevanagariSanskritpublished170 pages

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Page 128

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ११६ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- ब्राह्मणस्य यदा भुङ्क्ते १द्वे सहस्रे तु दापयेत् । अथवा वामदेव्येन २साम्नैवैकेन शुद्ध्यति ॥१९॥ किसी ब्राह्मण के घर सूतक में भोजन करने से दो हजार गायत्री का जाप अथवा 'वामदेव्य' साम अर्थात् 'कया नश्चित्र०' से लेकर तीन मन्त्र का एक पाठ कर लेने से ही शुद्धि हो जाती है ॥१९॥ शुष्कान्नं गोरसं स्नेहं शूद्रवेश्मन ३आहृतम् । पक्वं विप्रगृहे ४भुक्तं भोज्यं तन्मनुरब्रवीत् ॥२०॥ शूद्र के घर का सूखा अन्न, गाय का दूध और घी, तेल आदि ब्राह्मण के घर में पकाकर भक्षण के योग्य होता है। ऐसा मनुजी ने आदेश दिया है ॥२०॥ औपत्कालेषु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे यदि । मनस्तापेन शुद्ध्येत ६द्रुपदां वा ७जपेच्छतम् ॥२१॥ यदि कोई ब्राह्मण विपत्तिकाल में शूद्र के घर का बना हुआ भोजन कर ले तो मन में पश्चात्ताप कर लेने मात्र से ही उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा सौ बार 'द्रुपदादिव०' मन्त्र का पाठ करने से दोष नष्ट हो जाता है ॥२१॥ दास - नापित-गोपाल - कुलमित्राऽर्द्धसीरिणः । एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चाऽऽत्मानं निवेदयेत् ॥२२॥ दास, नापित, गोपाल, अपने वंश का मित्र, अर्धसीरी तथा आत्म- समर्पणकारी शूद्र का अन्न भक्षणीय कहा जाता है ॥२२॥ १. 'द्विसहस्रं तु' इति । २. 'साम्ना चैकेन' इति । ३. 'शूद्रवेषेण' इति । ४. 'भुक्ते' इति । ५. 'आपत्काले तु' इति । ६. 'ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव । पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः ।' ७. 'शतं जपेत्' इति । ८. 'विधीयते' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal