पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
by महर्षि पराशर
Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)
Page 84 of 170
Read in context७२ पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी वैश्य रजस्वला स्त्री से छू जाय तो ब्राह्मणी रजस्वला त्रिपादकृच्छ्र तथा वैश्य की रजस्वला स्त्री पादकृच्छ्र व्रत करे। इस प्रकार दोनों की शुद्धि होती है ॥१५॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी शूद्रजां तथा । कृच्छ्रेण शुद्धयते पूर्वा शूद्रा दानेन शुद्धयति ॥१६॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी शूद्र जातीय रजस्वला स्त्री से स्पृष्ट हो जाय तो ब्राह्मणी सम्पूर्ण कृच्छ्र व्रत करे तथा शूद्रा स्त्री केवल दान से शुद्ध होती है ॥१६॥ स्नाता रजस्वला या तु चतुर्थेऽहनि शुद्धयति । कुर्याद् रजोनिवृत्तौ तु दैव-पित्र्यादि कर्म च ॥१७॥ रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करने के उपरान्त शुद्ध हो जाती हैं। परन्तु जब तक रज से उसकी पूर्ण निवृत्ति नहीं हो जाती, तब तक वह देवता तथा पितृकार्य करने की अधिकारिणी नहीं होती ॥१७॥ रोगेण यद्रजः स्त्रीणामन्वहं तु प्रवर्त्तते । नाऽशुचिः सा ततस्तेन तत् स्याद् १वैकालिकं मलम् ॥१८॥ यदि स्त्री को नित्य-प्रति रोग के कारण रज निकलता हो तो वह उस रज से अपवित्र नहीं होती। क्योंकि वह अकालिक धातुगत मल है ॥१८॥ साध्वाचारा न तावत् स्याद् रजो यावत् प्रवर्त्तते । रजोनिवृत्तौ गम्या स्त्री गृहकर्मणि चैव हि ॥१९॥ जब तक स्त्री को रज निकलता रहे तब तक वह देव तथा पितृकर्म की अधिकारिणी नहीं रहती। रजोनिवृत्ति के उपरान्त ही वह संभोग के योग्य तथा गृह-कर्म के योग्य होती है ॥१९॥ १. 'वैकारिकं मल' इति ।