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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

by मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास)

DevanagariHindipublished684 pages

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आठवां अध्याय : भावाश्रय फल १८७ स्त्रियों की कामवासना का मंगल से विशेष विचार करना चाहिये । स्त्रियों के मासिक धर्म प्रवाह का वर्ण रक्त है। पुरुष की कामवासना का विचार शुक्र से इसी कारण शुक्र वीर्य को भी कहते हैं जिसका सफ़ेद वर्ण है) किया जाता है। मंगल 'मकर' में उच्च का होता है शुक्र मीन में उच्च का होता है। इसी कारण कन्दर्प या कामदेव का नाम संस्कृत में मकरध्वज (मकर जिसकी ध्वजा या झंडे में है) और मीन केतन (मीन जिसके झंडे में है) कहा जाता है। न काम देव नाम का कोई शारीरक जन्तु या व्यक्ति है । न उसका कोई झंडा है । केवल एक सिद्धान्त को व्यक्त करने वाले यह् विशेषण हैं। काम का जल तत्व से विशेष सम्बन्ध है। समुद्र (जल) से लक्ष्मी हुई । लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र से इसी कारण मानी गई है। चन्द्रमा जल तत्व प्रधान होने से लक्ष्मी का भाई माना गया। लक्ष्मी का पुत्र काम- देव भी इसी जल तत्व के कारण माना गया है। वसन्त पंचमी को जब प्रायः शुक्र उच्च का होता है-कामदेव का जन्म दिन माना जाता है, वनस्पति जगत् में पहले कली होता है। इसमें जो पराग होता हैं उसे 'रज' कहते हैं । कन्याओं में काम प्रकट होने का प्रथम लक्षण रजदर्शन है । इसी कारण दोनों (कलियों तथा कन्याओं) के सम्बन्ध में 'रज' शब्द का प्रयोग किया गया है। पुष्प विकसित रूप है। इसीलिये मासिक धर्म में जब स्त्री होती है तो उसे संस्कृत में पुष्पिणी कहते हैं। इन्हें-पुष्प को कामदेव का बाण कहते हैं । उसके पाँच वाण हैं-जो फूलों के हैं। शब्द स्पर्श, रूप, रस गंध इन्हीं पाँच से मनुष्य में कामवासना उत्पन्न होती है, यही उसके पाँच बाण हैं। इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र में, जो निर्देश किये गये हैं वे गूढ़ सिद्धान्तों पर आधारित हैं, केवल थोड़ा सा दिग्दर्शन करा दिया गया है। अब आठवे घर के मंगल का फल बताते हैं । अष्टम में भी मंगल का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कुतनु (ख़राब शरीर वाला अर्थात् शरीर में कहीं रोग हो), धनहीन और अल्पाय होता है और लोग उसकी निन्दा करते हैं । ॥९॥