फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
by मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास)
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Read in context.२०० फलदीपिका यदि पंचम में राहु हो तो पुत्रहीन, कठोर हृदय, और कुक्षि में रोग वाला हो । पेट का नीचे का बग़ली भाग कुक्षि कहलाता है । ऐसा व्यक्ति नाक से बोलता है—अर्थात् उसके बोलने में अनुनासिकता विशेष रहती है । यदि छठे स्थान में राहु हो तो लक्ष्मीवान् और दीर्घायु हो, किन्तु छठे में राहु गुदा रोग उत्पन्न करता है । ऐसा व्यक्ति शत्रु द्वारा या क्रूर ग्रह द्वारा पीड़ित भी होता है । यदि सप्तम में राहु हो तो जातक स्वतन्त्र, किन्तु अल्पवुद्धि वाला हो, स्त्री संग से धन नष्ट हो जाय, ऐसा व्यक्ति विधुर और अवीर्य (कम पुंस्त्व वाला) हो जाता है । पत्नी रहित हो जाने को विधुर कहते हैं । यदि अष्टम में राहु हो तो जातक विकल, वात रोग से पीड़ित, अल्प सुत वाला, अल्पायु और अशुद्ध कर्म करने वाला होता है ॥ २६ ॥ यदि नवम में राहु हो तो जातक प्रतिकूल वचन बोलने वाला और अपुण्यवान् होता है (अर्थात् पुण्य कर्म न करने वाला) किन्तु किसी समुदाय, नगर या ग्राम का नेता होता है। यदि दशम में राहु हो तो थोड़े पुत्र वाला, दूसरे के कार्य में निरत, सत्कर्महीन, निर्भय, किन्तु विख्यात हो । यदि एकादश में राहु हो तो लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है किन्तु पुत्र थोड़े होते हैं और कान में कोई रोग होता है । द्वादश में राहु का निकृष्ट फल है । ऐसा व्यक्ति किसी जल रोग से पीड़ित और बहुत अधिक व्यय करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति प्रच्छन्न पाप भी करता है । अब केतु का विविध भावगतफल बताते हैं । लग्ने कृतघ्नमसुखंपिशुनं विवर्णं स्थानच्युतं विकलदेहमसत्समाजम् । विद्यार्थहीनमधमोक्तियुतं कुदृष्टि पातः परान्ननिरतं कुरुते धनस्थः ॥ २८ ॥