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प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

by मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी

DevanagariHindipublished181 pages

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३८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश दिया, जो सज्जनोंके चित्तरूपी कैदखानेमें आबद्ध थे । इस प्रकार जब वह सारवान् काव्यका उद्गार प्रकट कर रहा था तो राजाने उसका परितोषिक देनेमें अपनेको असमर्थ समझ कर अनुरोधपूर्वक रोक दिया। [ यहाँ P. B. नामक प्रतिमें निम्नांकित वर्णन अधिक पाया जाता है-] [ ४९ ] शीतसे रक्षा करनेके लिये पटी ( वस्त्र ) नहीं है, आग सुलगानेके लिये सगड़ी नहीं है । कमर भूमिपर घिस गई है-सोनेको शय्या नहीं है, कुटियामें हवाके रोकनेका कोई उपाय नहीं है, खानेको मुट्ठीभर चावल नहीं है, घड़ीभर भी मनमें संतोप नहीं है, शृंगार की कोई वृत्ति नहीं है, मनको प्रसन्न करनेवाली कोई प्रिया नहीं है, लेनदारोंसे संकटमें पढा हूँ; ऐसी दशामें हे भोजराज ! तुम्हारे कृपारूपी हाथी द्वारा ही मेरी इस आपदाकी तटीका नाश हो सकता है । इस श्लोकमें आई हुई ग्यारह टी' के हिसाबसे भोजराजने उसे ११ लाखका दान दिया। एक बार, किसी विद्वत्कुलके निवासके लिये घर देखे जा रहे थे। उनके न मिलनेपर राजाने कहा कि जुलाहों और मच्छीमारोंको उजाड़ दिया जाय । जब राजपुरुष उन्हें उजाड़ने लगे तो एक जुलाहा उन्हें रोककर राजाके पास गया, और बोला कि-महाराज ! क्यों हमें उजाड़ रहे हैं ? तो राजाने पूछा-क्या तू कविता करता है ? वह बोला- [ ५० ] जिसके चरणोंपर राजाओंके मुकुटके मणि लोटते रहते हैं ऐसे हे साहसांक महाराज,! मैं काव्य तो करता हूँ पर सुन्दर नहीं कर पाता । जैसा तैसा करता हूँ पर सिद्ध नहीं होता । मैं उसका क्या करूँ ? मैं कविता करता हूँ, कपडा बुनता हूँ और अन्न जाता हूँ । धीवरकी बहू भी हाथमें मांस लेकर राजाके पास गई और बोली- [ ५१ ] 'महाराज, तुम्हारी जय हो !'-' तू कौन है ?'-' लुब्धक (धीवर) की बहू । '- ' हाथमें यह क्या है ? '- ' मास ! '- ' सूखा क्यों है ? '-' यों ही '- और यदि महाराज ! आपको कौतुक हो तो कहती हूँ कि-तुम्हारे शत्रुओंकी प्रियाओंके आँसूकी नदीके किनारे सिद्धोंकी स्त्रियाँ गान करती हैं। गीतमें अन्धे होकर हरिण चरते नहीं । इसलिये उनका यह मास दुर्बल हो गया है । इस प्रकार उक्ति प्रायुक्तियुक्त ये दो काव्य सुनकर राजाने उन्हें नगरके भीतर स्थापन किया । एक बार, कोई विद्वान्, जो गर्वोद्धत था, उस नगरके निवासियोंको घरमें ही गरजनेवाले समझकर अवज्ञापूर्वक वादके लिये आया । नगरके समीप किसी पुरुषसे (धोबीसे) जो वस्त्र धो रहा था बोला-' अरे साड़ीका मैल धोनेवाले ! नगरमें क्या हालचाल हो रहा है ?' वह बोला- [ ५२ ] घोड़े तोरण लगे हुए मकानोंको ढोते हैं, गायें केसरके सहित कमलोंको चरती हैं, दही यहाँ- पर पीला मिलता है, तिलोंमें यहाँ तैल नहीं होता और मकानोंके दरवाजेके शिखरपर हिरण चरा करते हैं । इसके बाद, किसी बालिकासे पूँछा-' तू कौन है ?' तो वह बोली- [ ५३ ] मरे हुए जहाँ जींदा होते हैं, जिनकी आयु बीत गई हे वे उच्छ्वसित होते हैं और अपने गोत्रमें जहाँ कलह होता है, मैं उस कुलकी बालिका हूँ । इसका अर्थ न समझकर उसने विचार किया, कि जहाँ बालिका भी इस तरहकी विधानादी है वहाँके विद्वान् कैसे होंगे, यह उल्टे पाँव लौट गया । १ इस श्लोकमें ' टी ' जिसके अन्तमें है ऐसे पटी, कटी, कुटी, घटी, तटी इत्यादि ११ शब्द आये हैं उन शब्दोंको गिनकर ११ लाखका मो जने उस कविको दान दिया ऐसा इसका तात्पर्य है।

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