प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
by मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी
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Read in contextप्रकरण ५७ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४७ ८८. अहो ! मैने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया । इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है । ८९. हे जिन ! जबतक मैने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है । जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है; और कोई सफेद वस्तु, नजर नहीं आती । [ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ़ लेनेसे भी क्या होता है-यदि जिससे 'दूसरेको पीड़ा न पहुँचाना' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । [ ५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिम्बिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु सार्थ ( सर्वज्ञ जिन ) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं ! इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा । धनपाल बोला- ९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बड़े दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया । उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लौट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए छाग (बकरे) की दीन वाणी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये- ९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैने [इसके लिये] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ । तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधवोंका यज्ञ ( बलिदान ) क्यों नहीं करते ? उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि- ९३. यूप ( यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है ? ९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिध् ( काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय । इस प्रकार, शुक संवाद में कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस-प्रकृति हैं, ब्रह्मरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म ( जैन धर्म ) की ओर प्रवृत्त किया ।