BharatKosha
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

by आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished86 pages

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प्रबोधसुधाकर प्रबल प्रसूतिवायुके द्वारा संकुचित योनिछिद्रसे बाहर निकाला जाता है उस समयका क्लेश भी अकथनीय होता है। आधिव्याधिवियोगात्मीयविपत्कलहदीर्घदारिद्र्यैः । जन्मानन्तरमपि यः क्लेशः किं शक्यते वक्तुम् ॥१२॥ जन्मके अनन्तर भी आधि, व्याधि, वियोग, स्वजनोंकी विपत्ति, कलह और बहुत समयतक रहनेवाली दरिद्रता आदिसे जितना दुःख उठाना पड़ता है क्या उसका वर्णन किया जा सकता है ? नरपशुविहङ्गतिर्यग्योनीनां चतुरशीतिलक्षाणाम्। कर्मनिबद्धो जीवः परिभ्रमन्यातना भुङ्क्ते ॥१३॥ कर्मबन्धनसे बँधा हुआ जीव मनुष्य, पशु, पक्षी और तिर्यगादि चौरासी लाख योनियोंमें भ्रमता हुआ नाना प्रकारकी विपत्तियाँ झेलता है। चरमस्तत्र नृदेहस्तत्रोन्मान्वयोत्पत्तिः । स्वकुलाचारविचारः श्रुतिप्रचारश्च तत्रापि ॥१४॥ आत्मानात्मविवेको नो देहस्य च विनाशिताज्ञानम् । एवं सति स्वमायुः प्राज्ञैरपि नीयते मिथ्या ॥१५॥ उन सब योनियोंमें मनुष्य-देह सर्वश्रेष्ठ है; उस नरदेहमें भी उच्च कुलमें जन्म, अपने कुटुम्बके आचार-विचार तथा श्रुतिज्ञानको ४

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