प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
by आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (origin)
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Read in contextप्रबोधसुधाकर बिना द्वारके ऊँचे परकोटेवाले घरमें बंद किया हुआ सिंह बाहर निकलनेके बहुत-से प्रयत्न करनेपर अन्तमें थककर लम्बे-लम्बे श्वास लेता हुआ जैसे पड़ रहता है, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियोंके रोक देनेपर सैकड़ों उपायोंसे भी बाहर निकलना असम्भव जानकर चित्त शान्त होकर स्थिर हो जाता है और फिर धूम-धाम नहीं करता । प्राणस्पन्दनिरोधात्सत्सङ्गाद्वासनात्यागात् । हरिचरणभक्तियोगान्मनः स्ववेगं जहाति शनैः ॥७७॥ प्राण-स्पन्दनके रोक देनेसे, सत्संगसे, वासनाओंके त्यागसे और भगवच्चरणारविन्दोंकी भक्तिसे मन धीरे-धीरे अपने वेगको छोड़ देता है । वैराग्य परगृहगृहिणीपुत्रद्रविणानामागमे विनाशे वा । प्रथितौ हर्षविषादौ किं वा स्यातां क्षणं स्थातुः ॥७८॥ दूसरेके गृह, स्त्री, पुत्र और धनादिके आने-जानेसे होनेवाले हर्ष या विषाद क्या वहाँ क्षणभर ठहरनेवाले पुरुषको हो सकते हैं ? दैवात्स्थितं गतं वा यं कञ्चिद्विषयमीड्यमल्पं वा । नो तुष्यन्न च सीदन्वीक्ष्य गृहेष्वतिथिवन्निवसेत् । ७९ । २२