प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
by आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (origin)
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Read in contextप्रबोधसुधाकर लिंगदेहकी साररूपा बुद्धिमें प्रतिबिम्बित जो शुद्ध चैतन्य है उसीको पूर्वाचार्योंने जीव कहा है, जिसके कारण शरीरमें 'मैं' इस प्रकारकी स्फूर्ति होती है । चलतरतरङ्गसङ्गात्प्रतिविम्बं भास्करस्य च चलं स्यात् । अस्ति तथा चञ्चलता चैतन्ये चित्तचाञ्चल्यात् ॥११५॥ जिस प्रकार अति चञ्चल तरंगोंके कारण सूर्यका प्रतिबिम्ब भी चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्तकी चञ्चलतासे चैतन्यमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । नन्वर्कप्रतिविम्बः सलिलादिषु यः स चावभासयति । किमितरपदार्थनिवहं प्रतिविम्बोऽप्यात्मनस्तद्वत् ११६ शंका-जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब तो अन्यान्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है, क्या आत्म-प्रतिबिम्ब भी उसीके समान दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है ? प्रतिफलितं यत्तेजः सवितुः कांस्यादिपात्रेषु । तदनुप्रविष्टमन्तर्गृहमन्यार्थान्प्रकाशयति ॥११७॥ चित्प्रतिविम्बस्तद्वद्बुद्धिषु यो जीवतां प्राप्तः। नेत्रादीन्द्रियमार्गैर्बहिरर्थान् सोऽवभासयति ॥११८॥ ३४