प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
by आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (origin)
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Read in contextध्यानविधि आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डितश्रवणम् । मन्दस्मितमुखकमलं सुकौस्तुभोदारमणिहारम्॥१८६॥ वलयाङ्गुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्वलङ्कारान् । गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम् १८७ गुञ्जारवालिकलितं गुञ्जापुञ्जान्विते शिरसि । भुञ्जानं सह गोपैः कुञ्जान्तरवर्तिनं हरिं स्मरत॥१८८॥ श्रीयमुनाजीके तटपर स्थित वृन्दावनके किसी महामनोहर उद्यानमें जो कल्पवृक्षके नीचे पृथिवीपर पाँवपर पाँव रखे बैठे हैं, जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं, अपने तेजसे इस निखिल ब्रह्माण्ड- को प्रकाशित कर रहे हैं, सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, समस्त शरीरमें कर्पूरमिश्रित चन्दनका लेप लगाये हुए हैं, जिनके कर्णपर्यन्त विशाल नेत्र हैं, कान कुण्डलके जोड़ेसे सुशोभित हैं, मुख-कमल मन्द-मन्द मुसका रहा है, तथा वक्षःस्थलमें कौस्तुभ- मणियुक्त सुन्दर हार है और जो [ अपनी कान्तिसे ] कङ्कण और अंगूठी आदि सुन्दर आभूषणोंकी भी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटक रही है और अपने तेजसे जिन्होंने कलिकालको परास्त कर दिया है तथा जिनका गुञ्जावलिविभूषित मस्तक गूँजते हुए भ्रमर-समूहसे सुशोभित है, किसी कुञ्जके भीतर बैठकर ग्वालबालोंके साथ भोजन करते हुए उन श्रीहरिका स्मरण करो । ५३