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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

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( ९ ) और परीक्षणों से यह स्पष्ट है कि इन नाटकों का समस्त अंश भास की रचना नही है। तृतीय मत—इस वर्ग के विचारक इन तेरह रूपकों को भास कृत मानते हैं, क्योकि— (1) इन सभी रूपको मे आकृति की समता पाई जाती है। अतः इनका रचयिता एक ही व्यक्ति है। (2) प्राचीन उदाहरणो मे स्वप्नवासवदत्तम् भास की कृति सिद्ध है तथा ये सभी रूपक उसके ही समान है। (3) सस्कृत रूपकों की परम्परा के अनुसार नान्दी पाठ के बाद सूत्रधार रगमच पर प्रवेश करता है, किन्तु इन 13 रूपकों मे नान्दी पाठ की योजना प्रस्तावना मे सम्मिलित नही है। (4) लगभग सभी रूपको के अन्त में भरत वाक्य का अन्तिम चरण "राजसिंहः प्रशास्तु न." लिखा है। (5) इनमे प्ररोचना का अभाव है तथा अनेक रूपको मे पताका स्थान एव गण्ड का प्रयोग है। (6) इन सभी नाटकों मे अपाणिनीय प्रयोग भी समान रूप से मिलते है। (7) भरत नाट्यशास्त्र के नियमो का उल्लघन समान रूप से ही इन नाटको मे पाया जाता है। (8) युद्ध की सूचना और युद्ध का वर्णन भटो द्वारा किया गया है। (9) मुद्रा अलकार का प्रयोग चारुदत्त और अविमारक को छोड़ कर शेष सभी नाटको में पाया जाता है। इसमे नाटक के प्रमुख पात्रो के नाम तथा अभीष्ट देवता की स्तुति की गई है। (10) कंचुकी और प्रतिहारी के नामों की कई नाटको में पुनरावृत्ति हुई है। ये नाम क्रमशः बादरायण और विजया है। (11) प्रायः सभी नाटकों में प्रस्तावना के स्थान पर "स्थापना" का प्रयोग हुआ है। इन रूपको में अन्य किसी भी ग्रन्थकार का नाम नही मिलता। छन्दो के प्रयोग भी प्रायः समान है। (12) इन सभी नाटको मे साम्य भी उपलब्ध है, जैसे—

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