प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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भास की उपमाओं, भावों व शब्दो आदि से प्रभावित हैं। वल्कल धारण से सौन्दर्य की वृद्धि, तपोवन का वर्णन, शाप की कल्पना, वृक्ष व लताओं के प्रति स्नेह, भाग्यदशा का चित्रण आदि के भाव कालिदास ने भास से ग्रहण किए हैं। भास के चारुदत्त का परिवृंहण कर शूद्रक ने मृच्छकटिक की रचना की है। इन दोनो रूपको की कथावस्तु समान है तथा भावों का अंकन भी उसी प्रकार पाया जाता है। इसे हम भास का प्रभाव ही नहीं कह सकते, अपितु पूर्णतया अनुकरण मान सकते है। विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में भी भास के भावों, विचारों और शब्दो के प्रयोग में पर्याप्त समता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा परिस्थिति विशेष में विभिन्न मानसिक स्थितियों का चित्रण विशाखदत्त मे भास के समान पाया जाता है। नाटककार हर्ष भी भास से पर्याप्त प्रभावित है। रत्नावली नाटिका की कथावस्तु का आधार वृहत्कथा चाहे न भी हो पर स्वप्नवासदत्तम् अवश्य है। स्वप्न नाटक में वर्णित उदयन और वासवदत्ता की कथा रत्नावली में यत्किंचित् परिवर्तन के साथ गृहीत है। भवभूति की तीनों रचनाओ पर भास का पर्याप्त प्रभाव है। इनके उत्तर राम- चरित की चित्रवीथि कल्पना पर भास का प्रभाव पाया जाता है तथा और भी कई भाव साम्य हैं। भट्टनारायण ने वीर रस प्रधान वेणीसंहार नामक नाटक की रचना की है, जो महाभारत के आख्यान पर आधृत है। इस नाटक की कथावस्तु के गठन मे भट्टनारायण ने वीर रस प्रधान एकांकी उरुभंग तथा दूतवाक्य का अध्ययन अवश्य किया है। मुरारि कवि ने अपने अनर्घराघव नाटक में भास अभिषेक और प्रतिमा नाटक से उपमाएँ एव कल्पनाएँ ग्रहण की हैं। राज- शेखर के नाटकों पर भी भास की कृतियों का ऋण है। जयदेव कवि के प्रसन्न- राघव पर भी भास का प्रभाव परिलक्षित होता है। इस प्रकार सस्कृत के सभी नाटककारो ने भास से कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य ग्रहण किया है। भास की भाषा शैली भास के नाटको में कल्पना, भावना और कवित्व का प्राचुर्य है, जिसके कारण उनकी भाषा में काव्यात्मकता की प्रधानता है। इनकी भाषा शैली पात्रो के भावो और विचारों के अनुरूप है। शैली की विशेषता के ॰ ॰