प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in contextवाला उनका प्रसाद गुण अत्यधिक सहायक हुआ है। रूपको का प्राण प्रसाद- गुण है, यह स्वीकार करने मे कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योकि रूपक गति- शील होता है। जिस गति से वह चलता है, उसी गति से यदि भाषा सामा- जिको की समझ मे नही आती तो रूपक का समस्त आनन्द ही समाप्त हो जाता है। अतः रूपक को गतिशील बनाए रखने के लिए उसमे प्रसाद गुण की सर्वाधिक आवश्यकता है। बोलचाल की भाषा—भास ने बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। यही कारण है कि इनकी भाषा मे अनेक अपाणिनीय प्रयोग भी सम्मि- लित है। ये आत्मनेपद के स्थान पर परस्मैपद का अथवा इसका विपरीत प्रयोग करते है। इसी प्रकार इन्होने अकर्मक क्रियाओ का सकर्मक प्रयोग भी किया है। यही नही, भास ने समास की प्रक्रिया मे भी कुछ नवीन प्रयोग किए है, जो पाणिनि से मेल नही खाते। इन्होने कई नए तथा क्लिष्ट शब्दो का प्रयोग भी किया है। शैली मे तीनों गुणो का समावेश—शास्त्रीय दृष्टि से भासकी शैली में ओज, प्रसाद व माधुर्य इन तीनो गुणो का समावेश पाया जाता है। ये मधुर तथा मनोरम शैली का प्रयोग वही करते है, जहा किसी व्यक्ति की कोमल भावनाओ की अभिव्यक्ति करनी होती है अथवा रम्य प्रकृति का वर्णन करना अभीष्ट होता है। यह सत्य है कि जब कल्पना की दुरूहता और अलकारो के बोझ से भाषा की सहज माधुरी दब जाती है, तब रसोद्रेक मे क्षीणता उत्पन्न होती है। भास ने बलपूर्वक अलकारो का उपयोग नही किया है। सशक्त शैली का प्रयोग—भास की वर्णन कला प्रौढ एव अपने ढंग की अनोखी है। शैली को सशक्त बनाने के लिए इन्होने आम, वाढम् यदि, चेत् तथा कुशल प्रश्न के लिए 'सुखमार्यस्य'' का प्रयोग किया है। इससे ज्ञात होता है कि नाटककार दृश्यो के चित्रण मे अत्यन्त पटु है। इस प्रकार के वर्णनो के आधार पर चित्राकन किया जा सकता है। शैली की सक्षिप्तता के कारण छोटे-छोटे वाक्यो मे गभीर तथा रसपेशल भावो की व्यजना प्रस्तुत की गई है। वाग्विस्तार का परिहार—भास के पात्रो ने शैली की विशेषता के कारण कम से कम शब्दो मे अधिक से अधिक भावो की अभिव्यजना की है।