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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

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आसीनैः = बैठे हुए । निवपनक्रियां = पिण्डदान को । चिन्तयद्भिः = सोचते हुए । भीता = डरी हुई । वेपते = कापती है । अलम् = व्यर्थ । सम्भ्रमेण = सन्देह करना । अतिक्रान्तः = बीत गया । दिशः = चारों ओर । रेणुः = धूलि । समुत्पतति = उड़ रही है । लोध्रसमानगौरः = लोध के समान श्वेत वर्ण की । सम्प्रा- वृणोति = अच्छी तरह ढक रही है । पवनावधूतः = हवा से उड़ाई गई । पटह- स्वनधीरनादैः = नगाड़े की ध्वनि की गम्भीर गर्जना से । सम्मूर्च्छितः = अच्छी तरह बढ़ा हुआ । नगरीकरोति = नगर बना रहा है । अन्वय — समुदितबलवीर्यम् रावणं नाशयित्वा, जगति गुणसमग्रो विशुद्धां सीतां प्राप्य, गुरूणां वचनम् अपि अन्तशः पूरयित्वा, भूयः मुनिजन- वनवासं प्राप्तवान् अस्मि । (२) अन्वय — सखी इति, सीता इति, जानकी इति च, यथावयः स्निग्धं- तरं स्नुषा इति जनकेन्द्रपुत्री तपस्विदारै सम्भाष्यमाणा मन्दम् समुपैति । (३) अन्वय — लोध्रसमानगौरः रेणुः समुत्पतति, च पवनावधूतः दिशः सम्प्रावृणोति । पटहस्वनधीरनादैः सम्मूर्च्छितः शङ्खध्वनिः इदं वनं नगरी- करोति । (४) हिन्दी अर्थ (इसके बाद राम प्रवेश करते हैं) राम—अहा, अत्यन्त पराक्रम सम्पन्न रावण को मार कर, संसार में सभी गुणों से पवित्र सीता को प्राप्त कर, पिताजी की आज्ञा का भी पूरी तरह से पालनकर पुनः मुनियों के इस निवास स्थान में आ गया हूँ । (२) मुनियों की स्त्रियों की वन्दना करने के लिए अन्दर गई हुई सीता काफी विलम्ब कर रही है । (देखकर) अरे, यह सीता किसी के द्वारा सखी, किसी से सीता, किसी से जानकी इस प्रकार उम्र के अनुसार सम्बोधित की जा रही है । कोई इसेअत्यन्त स्नेह से, 'बहू' कह रही है। इस प्रकार यह सीता अन्य तपस्वियों की पत्नियों के साथ वार्तालाप करती हुई धीरे-धीरे इधर ही आ रही है । (३) (इसके बाद सीता और तापसी का प्रवेश) तापसी—अरी, ये तुम्हारे भर्ता हैं । इनके पास जाओ। मैं तुमको अकेली नहीं देख सकती हूं।