प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( 22 ) पितृभक्त पुत्र के रूप में दशरथ के श्राद्ध हेतु कांचनपाश्र्वं मृग को लाने के लिए प्रस्थान करते हैं ? (2) सीता (1) प्रतिमा की सीता का चरित्र भी अत्यन्त सुकुमार एवं उदात्त है। प्रथम अंक में जब वह अवदातिका और चेटी के साथ वार्तालाप करती हुई दिखाई देती है, तो वल्कल वस्त्र को देखकर सीता के हृदय मे स्वाभा- विक रूप मे उसे पहनने की उत्कण्ठा जागृत होती है। यहाँ उसका भोलापन अत्यन्त सहज तथा आकर्षक है । (2) (सीता भी राम के समान ही उदार चरित्र वाली हैं)। न तो उसे उस समय अत्यधिक प्रसन्नता होती है, जब उसे राम के अभिषेक की सूचना मिलती है, और न उसे अत्यन्त दुःख होता है, जब उसे राम के वनवास का पता चलता है। राजकुल के इस उतार-चढाव से उसे कोई लेना-देना नही है- "बहुवृत्तान्तानि राजकुलानि नाम ।' (3) कैकेयी के आदेश को वह भी धीरता से सुनती है। जब लक्ष्मण आवेश में आकर स्वयं युद्ध करने हेतु धनुष धारण करने की बात कहता है, तो सीता राम से कहती है कि "देखो, लक्ष्मण ने रोने के अवसर पर धनुष उठाया है।" इससे पता चलता है कि सीता के हृदय में दशरथ के प्रति भी अपार सम्मान था । (4) (सीता का भरत के प्रति भी अपार वात्सल्य है)। जब भरत ननिहाल से लौटकर वन में गए राम को वापस अयोध्या लाने जाता है और राम से अनुनय-विनय करता है, तो सीता के इस वाक्य मे, "आर्यपुत्र, प्रतिकरुण मन्त्रयते भरतः" सब कुछ प्रकट हो जाता है। उसकी ममता भरत को कुछ समय और अपने पास रखने को प्रेरित करती है । (5) वनवास के जीवन में भी सीता अपने सहज कार्यों को सम्पन्न करती है। तपोवन के पादपो को पुत्रवत् अपना स्नेह प्रदान कर पालती है। राम का संकेत पाकर परिव्राजक के रूप में आए रावण अतिथि का सत्कार करती है तथा उसके द्वारा अपहरण करने पर राम और लक्ष्मण को अपनी रक्षा हेतु पुकारती है ।