प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( 44 ) अवदातिका—महारानी, यह वल्कल वस्त्र है। सीता—यह वल्कल कहां से लाई हो ? अवदातिका—महारानीजी सुनिए। नेपथ्य रक्षिका आर्या रेवा है। उससे मैंने कहा कि यह अशोक पत्र, जो कि नाटक में काम आ चुका है, हमें दे दे। किन्तु उसने नहीं दिया। इस कारण उसके स्थान में यह वल्कल ही उठा लाई। सीता—यह तो बुरा किया। जा वापस लौटा दे। अवदातिका—महारानी, इसे तो मैं हसी मे ले आई हूं। सीता—अरी पागल, उसी प्रकार तो बुराई बढती है। जा, इसे लौटा दे, लौटा दे। अवदातिका--जैसी महारानी जी की आज्ञा। (जाना चाहती है) सीता—अरी, जरा इधर तो आ। अवदातिका—महारानी, यह मैं आई। सीता—अरी, क्या यह वल्कल मुझे भी अच्छा लगेगा ? अवदातिका—महारानी, सुन्दर रूप पर तो सभी चीजें खिलती हैं। आप इसे धारण करें। सीता—अच्छा ला। (लेकर तथा पहन कर) अरी, देख तो। क्या अब यह अच्छा लगता है ? अवदातिका—आपको तो अच्छा लगता है। यह वल्कल तो अब सुवर्ण निर्मित सा प्रतीत होता है। सीता—हे सखी, तुम कुछ नहीं बोल रही हो। चेटी—बोलने की आवश्यकता ही नहीं है। ये हमारे प्रसन्न रोमांच ही कह रहे हैं। (पुलकित होती है) सीता—अरी सखी, जरा शीशा तो ला। चेटी—जैसी महारानी की आज्ञा। (जाकर और आकर) महारानी, यह शीशा लीजिए। सीता—(चेटी के मुख की ओर देख कर) इस दर्पण को रहने दे। तू कुछ कहना चाह रही है, ऐसा लगता है।