प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( 69 ) अन्वय—उत्थाय च उत्थाय हा हा इति मुहुः उच्चैः लपन् पतति । या रघूद्वहः यात. ताम् एव दिशं पश्यति । (३) हिन्दी अर्थ (इसके वाद काञ्चुकीय श्राता है ) काञ्चुकीय—हे द्वारपालो, श्राप अपने स्थानों पर सावधान रहें । (प्रवेश करके) प्रतीहारी—श्रार्ये, यह क्या है ? काञ्चुकीय—ये प्रतिज्ञापालक महाराज दशरथ राम को वन जाने से लौटा न सके और अब पुत्रवियोग के दुःख की ज्वाला से सन्तप्त हृदय होकर पागलो के समान प्रलाप करते हुए समुद्रगृह मडल मे लेटे है, जो— प्रलय के समीप श्राने पर डगमगाते हुए सुमेरु के समान, सूखते हुए सागर के समान, गिरते हुए व मण्डल मात्र दीखने वाले सूर्य के समान श्रपार शोक सागर मे निमग्न दुर्बलकाय व हीन चेतना वाले होते जा रहे है । (१) प्रतीहारी—हाय, क्या महाराज ऐसे हो गए हैं । काञ्चुकीय—देवी, जाश्रो । प्रतीहारी—श्रार्य, ठीक हैं । (निकल जाती है ) काञ्चुकीय- (चारो श्रोर देख कर) अहो, जिस दिन से राम वन में गए है, यह अयोध्या सूनी सी दीख रही है । क्योकि— गजराजो ने चारा खाना छोड़ दिया है । श्रांसुश्रों से भरी आँखों वाले घोडो ने हिनहिनाना वन्द कर दिया है । वृद्ध, स्त्रियाँ, बालक और युवक सभी नगरवासियो ने भोजन की बात भुला दी है तथा जोर- जोर से रोने के कारण उनके चेहरे उतर गए है । ये सब उसी दिशा की ओर देखते रहते है, जिधर राम, लक्ष्मण और सीता गये हैं । (२) जितने मैं भी महाराज के पास चलूँ । (घूम कर श्रोर देख कर) श्ररे, ये महाराज बैठे है । कौसल्या तथा सुमित्रा श्रत्यन्त श्रसहनीय पुत्र वियोग को भी किसी भांति सह कर महाराज को आश्वासन देती हुई उनकी सेवा में लगी हैं - सचमुच मे बड़ी दु.खपूर्ण स्थिति है । श्रोर ये महाराज-