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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

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( 73 ) ओह, कैसा आश्चर्य है कि लक्ष्मण ने भाई के स्नेह के आगे पिता के स्नेह को तिलांजलि दे दी, फिर भी उसे देखने को मेरा हृदय लालायित हो रहा है। हे बहू सीते, राम ने मुझे छोड़ दिया, लक्ष्मण ने भी तिरस्कार कर दिया और तुम्हारे द्वारा परित्याग किया गया मैं संसार में अपयश का पात्र बना। (५) हे पुत्र राम, वत्स लक्ष्मण, बहू सीते, मुझे प्रत्युत्तर दो है। पुत्रों यह तो सब कुछ सूना है। अरे, कोई भी मुझे उत्तर नही दे रहा है। हे राम, तुम कहां हो ? हे सत्यप्रतिज्ञ, जितक्रोध, मात्सर्यशून्य, गुरु की सेवा में निरत, मुझे प्रत्युत्तर तो दो। (६). हा, वह सभी के हृदय और नेत्रों को सुन्दर लगने वाला राम कहां है। उसकी मुझ में गुरुभक्ति कहां है। दुःखी व्यक्तियों पर दया दिखाने वाला कहां है। राज्य भोग को तिनके के समान समझने वाला कहा है। हे पुत्र राम, मुझ वृद्ध पिता को छोड़ कर इस असम्बद्ध धर्म से तुझे क्या लेना-देना। हाय, धिक्कार है । कैसा भयंकर दुःख है। सूर्य के समान राम चला गया। सूर्य के पीछे दिन की भांति लक्ष्मण भी गया। सूर्य और दिन के चले जाने पर छाया की तरह सीता भी नही दिख रही है। (७) (ऊपर की ओर देख कर) अरे दुर्देव, मुझे निस्सन्तान, राम को किसी दूसरे राजा का पुत्र और कैकेयी को वन में सिंहनी बनाना चाहिए था। फिर तुमने ये तीनो कार्य क्यों नही किए। (८) कौसल्या—(रोती हुई), महाराज, अब आप अधिक दुःख न करें तथा विलाप करके अपना धैर्य न खोयें। चौदह वर्ष के व्यतीत होने पर आप सीता और उन दोनों राजकुमारों को अवश्य देखेंगे। राजा—अरे, तुम कौन हो ? कौसल्या—मैं उस अप्रिय पुत्र की जननी हूं । राजा—क्या तुम उस राम की मां कौसल्या हो, जो सभी के हृदय और नेत्रों के लिए सुन्दर है ?

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