प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( 78 ) सुमन्त्र—महाराज, इस प्रकार के अशुभ वाक्य मत कहिए। आप शीघ्र ही उन्हें देखेंगे ! राजा—सचमुच में मैंने अनुचित कहा है। यह तपस्वियों के योग्य प्रश्न नहीं है। अतः अब बताओ। क्या तपस्वियों का तप तो बढ़ रहा है। क्या वन में स्वेच्छा से घूमती हुई सीता दुःखी तो नहीं है। सुमित्रा—हे सुमन्त्र, बहुत से वल्कलों से आभूषित शरीर वाली, बाला होकर भी आदर्श आचरण वाली, पति के साथ धार्मिक कृत्य करने वाली सीता ने हमें और महाराज को क्या कुछ नहीं कहा है। (४) मूल सुमन्त्रः—सर्व एव महाराजम्— राजा—न न। श्रोत्ररसायनैर्मम हृदयातुरीषधैस्तेषां नामधेयैरेव श्रावय। सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः। आयुष्मान् रामः। राजा—राम इति। अयं रामः। तन्नामश्रवणात् स्पृष्ट इव मे प्रति- भाति। ततस्ततः। सुमन्त्रः—आयुष्मान् लक्ष्मणः। राजा—अयं लक्ष्मणः। ततस्ततः। सुमन्त्रः—आयुष्मती सीता जनकराजपुत्री। राजा—इयं वैदेही। रामो लक्ष्मणो वैदेहीत्ययमक्रमः। सुमन्त्रः—अथ × कः क्रमः ? राजा—रामो वैदेही लक्ष्मण इत्यभिधीयताम्। रामलक्ष्मणयोर्मध्ये तिष्ठत्वत्रापि मैथिली। बहुदोषान्यरण्यानि, सनाथैषा भविष्यति ॥ (१५) सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति महाराजः। आयुष्माम् रामः। राजा—अयं रामः। सुमन्त्रः—आयुष्मती जनकराजपुत्री। राजा—इयं वैदेही। सुमन्त्रः—आयुष्मान् लक्ष्मणः। राजा—अयं लक्ष्मणः। राम ! वैदेहि ! लक्ष्मण ! परिष्वजध्वं मां पुत्रकाः !