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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

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( 83 ) अन्वय—रामः गतः प्रियं ते अस्तु, जीवितैः अहम् अपि व्यक्तः । पुत्रः क्षिप्रम् आनीयताम् । पापम् सफलम् अस्तु । (२०) अन्वय—अयम् अमरपतेः सखा दिलीपः, अयं रघुः, अत्रभवान् मे पिता अजः । अभिगमनकारणं किम् ? तत्रभवद्भिः सह वसने ममापि समयः । (२१) हिन्दी अर्थ दोनो रानियां—महाराज, धीरज रखे, धीरज रखें । राजा—(कुछ संभल कर) कौसल्या, मेरे अंगों पर हाथ फेरो । मै तुम्हे नेत्रो से नही देख रहा हूँ । राम की ओर गया हुआ मेरा हृदय अभी भी नही लौट रहा है । (१८) हे पुत्र राम, मै सदा से सोचता आ रहा था कि— तुम्हे राजगद्दी पर बैठा कर, प्रजा को उत्तम राजा के लाभ से सफल मनोरथ कर, तुम्हे यह कह कर कि अपने भाइयो को सदा अपने समान ऐश्वर्य शाली बनाए रखना, मै छुटकारा प्राप्त कर, इस वृद्धावस्था को तपोवन में बिताऊँगा । किन्तु इन सब बातो को कैकेयी ने एक क्षण में पलट डाला । ( १६ ) सुमन्त्र, जाओ, कैकेयी से कह दो— राम वन चले गए । तुम अपना मनोरथ पूर्ण कर लो । मुझे भी मेरे प्राण छोड चले । अब तुम अपने पुत्र को जल्दी से बुलवा लो तुम्हारा पापमय कृत्य सफल हो जाए । (२०) सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । राजा—(ऊपर की ओर देख कर) अरे, राम के विवरण के सुनने से दुःखी हृदय वाले मुझे धैर्य बँधाने के लिये पितर लोग आ गए है । अरे, यहाँ कौन है ? (प्रवेश करके) काञ्चुकीय—महाराज की जय हो । राजा—जरा जल लाओ । काञ्चुकीय—जो महाराज की आज्ञा । (निकलकर और प्रवेश करके) महाराज की जय हो । ये जल है ।