प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( ८८ ) सुधाकार—मुझ अभागे के कार्तवीर्य के समान हजार भुजाएँ नहीं हैं । भट हजार भुजाओ के होने पर क्या करते ? सुधाकार—तुमको समाप्त कर देता । भट—अरे, दासीपुत्र, अब तो दम निकाल कर ही छोडूंगा । (फिर पीटता है) सुधाकार—(रोकर) हे स्वामी, क्या मैं इस समय मेरा दोष जान सकता हूँ भट—कुछ दोष नही, सचमुच तेरा कुछ दोष नही है । मैंने जो कहा था कि राजकुमार राम को राज्य न मिलने से उत्पन्न होने वाले दुःख से मृत्यु को प्राप्त होने वाले राजा दशरथ के प्रतिमा-गृह को देखने आज कौसल्या आदि के साथ समूचा रनिवास यहाँ आ रहा है । तो फिर तूने यहाँ क्या किया है ? सुधाकार—स्वामी देखिए । गर्भगृह मे बनाए गए कबूतरो के घोसलों को हटा दिया है । दीवारें सफेदी से पोत दी हैं और उन पर चन्दन से पचांगुलिका के आकार बना दिए गए हैं । दरवाजों को पुष्प- मालाओं से सजा दिया है । चारो ओर रेत बिछा दी गई हे । यहाँ अब मैंने क्या नहीं किया ? भट—यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर जाओ । मै भी मन्त्री जी को-पूरी तैयारी की सूचना दे देता हूँ । (दोनों निकल जाते है) (प्रवेशक) (इसके बाद रथ में बैठे भरत और सारथि का प्रवेश) भरत—(चिन्तापूर्वक) सारथि, बहुत समय तक मामाजी के यहाँ रहने के कारण मुझे घर के कोई समाचार नहीं मिले । मैंने सुना था कि महाराज अधिक रुग्ण है । अतः कहो—मेरे पिताजी को कौन सा रोग है ? सूत—दारुण मानसिक सन्ताप । भरत—उनको वैद्यो ने क्या कहा ? सूत—वहाँ कोई चतुर वैद्य नही, जो बता सके । भरत—उनके खाने और सोने की क्या व्यवस्था है ? सूत—पृथ्वी पर बिना भोजन किए रहते हैं ।