प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( ९१ ) अन्वय— पितुः पादयोः शिरः पतितम् इव। स्निह्यता राज्ञा समुत्था- पितः इव अस्मि। भ्रातरः त्वरितम् उपगता इव। मातरः अश्रुभिः माम् क्लेदयन्ति इव। सदृशः इति, महान् इति, व्यायतः च इति भृत्यैः सेवया अहम् स्तुतः इव। तत्र आत्मनः वेषं च भाषां च सौमित्रिणा परिहसितम् इव पश्यामि। (३) अन्वय—पितुः प्राणपरित्यागम्, मातुः ऐश्वर्यलुब्धताम्, ज्येष्ठभ्रातुः प्रवासम्, त्रीन् दोषान् कः अभिधास्यति। (४) हिन्दी अर्थ भरत—(रथ की गति को देख कर) अहा। रथ किस तीव्रता से भागा जा रहा है। ये वृक्ष रथ की तेज गति के कारण आँखों से ओझल होते हुए मानो दौड़ रहे हैं। भँवर से युक्त जल वाली नदी की भाँति पृथ्वी धुरी के छिद्र में मानो गिर रही है। बड़ी तेजी से घूमने के कारण चक्र के आरे दीख नहीं रहे हैं। रथ का पहिया वेग से मानो गति हीन हो रहा है और धूलि घोड़ों के खुरों से उड़ कर सामने ही गिरती है पीछे नहीं। (२) सूत—हे दीर्घायु, वृक्षों की सघनता तथा शीतलता से जान पड़ता है कि अयोध्या पास में ही है। भरत—अहा, आत्मीय जनों को देखने के लिए मेरा मन कितना उतावला हो रहा है। क्योंकि, इस समय—ऐसा लग रहा है कि पिताजी के चरणों में मेरा सिर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे प्रेम से उठा सा लिया है। भाई शीघ्रता से आकर मुझे घेर से रहे हैं। जननियां आँसुओं से मुझे भिगो सी रही हैं। भरत पहले के समान ही है, पहले से बड़े हो गए हैं, इस प्रकार कहते हुए सेवक लोग मेरी सेवा करते हुए प्रशंसा कर रहे हैं और लक्ष्मण मेरी निम्न प्रकार की वेशभूषा तथा बोली पर परिहास कर रहा है। (३) सूत—(मन में) अरे, दुःख की बात है कि यह राजकुमार महाराज की मृत्यु को नहीं जान कर भावी मिथ्या आशा को लिए हुए अयोध्या में प्रवेश