प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context'जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद्भूरितावस्थां महानन्दमयो भवेत् ॥ गीतादिविषयास्वादासौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥ यत्र तत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं संप्रकाशते ।' इति । एवमन्यदपि आनन्दपूर्णस्वात्मभावनादिकम् अनुमन्तव्यम् । इत्येवमादयः अत्र मध्यविकासे उपायाः ॥१८॥ मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः, स एव च परमयोगिनः समावेश- समापत्त्यादिपर्यायः समाधिः, तस्य नित्योदितत्वे युक्तिमाह "जब कोई खान-पान से प्रकट होनेवाले आस्वाद के आनन्द के विस्तार का अनुभव करता है, तो उसे चाहिए कि वह उस आनन्द की पूर्णावस्था पर ध्यान करे । ऐसा करने से वह महानन्द से परिपूर्ण हो जायगा । जब गीतादिविषयों के अनुपम आनन्द से कोई योगी एकात्म हो जाता है, तब ऐसा एकाग्रचित्त योगी तन्मय होने के कारण उस आनन्द से तादात्म्य का अनुभव करता है । जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है, साधक को चाहिए कि उसी पर ध्यान लगावे । (ध्यान के अभ्यास से) उसे उसमें से ही परमानन्द के स्वरूप का भान होगा^{१६८} ।" (वि. भै. ७२, ७३, ७४ श्लोक) ऐसे ही आनन्दपूर्ण आत्मा की अन्य प्रकार की भावनाओं का अनुमान किया जा सकता है । सूत्र में जो आदयः (इत्यादि) शब्द आया है वह मध्य के विकास के लिए इसी प्रकार के उपायों को इंगित करता है ॥१८॥ मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है यही (चिदानन्द का का लाभ ही) परमयोगी का (वास्तविक) समाधि है जिसके समावेश^{१६९} समापत्ति इत्यादि समानार्थवाची शब्द हैं । उसके (समाधि के) नित्य प्रकट रहने का निम्नलिखित उपाय कहते हैं ।