प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context१०६ प्रत्यभिज्ञाहृदय १४. सूत्र—सूत, तागा, जो सूत के समान कुछ विचारों को एक साथ ग्रथित किये रहता है। थोड़े से अक्षरों में कहा हुआ वचन जो बहुत अर्थ व्यक्त करे 'सूत्र' कहलाता है। यहाँ सूत्र एक पारिभाषिक शब्द है। सूत्र का लक्षण इस प्रकार कहा गया है—'स्वल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रविदो विदुः' अर्थात् सूत्र के जानकार (उसको) सूत्र मानते हैं जिसमें कम अक्षर हों, जिसमें (अर्थ के विषय में) कोई सन्देह न हो, जो सारपूर्ण हो, जो सर्वत्र लागू हो, जिसमें व्यर्थ के शब्द न हों और जो निर्दोष हो । १५. स्वतंत्रा--यह चिति का विशेषण है। 'स्वतंत्रा' का अर्थ है जो स्व अर्थात् अपने ही ऊपर अवलम्बित है, किसी दूसरे से सहायता नहीं लेती, जो सब बन्धनों से मुक्त है और जो सब कुछ सम्पादन करने में समर्थ है। १६. चिति समष्टि वित् को कहते हैं। यह परासंवित् अर्थात् सर्वोत्कृष्ट संवित् या शिव की शक्ति है। चिति समष्टि संवित् है। चित्त व्यष्टि संवित् है। चित् शब्द प्रायः शिव के लिए प्रयुक्त होता है और चिति उसकी शक्ति के लिए। १७. 'सिद्धि' शब्द के कई अर्थ हैं जो कि इस सूत्र के भाष्य में बतलाये गए हैं। मुख्यतः इसका अर्थ है सम्पादन अर्थात् काम का पूरा होना विश्व की सिद्धि में विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार सभी अन्तर्भूत हैं। १८. सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य—सदाशिव से लेकर पृथिवी तक। इस दर्शन के अनुसार ३६ तत्व हैं। ये दो भागों में बाँटे जा सकते हैं (१) शुद्ध अध्वा और (२) अशुद्ध अध्वा। अध्वा का अर्थ है रास्ता, मार्ग, पद्धति, प्रकार, क्रम, काल। शिव की अभिव्यक्ति का मार्ग या पद्धति जो माया से ऊपर है, जहाँ तक वेदक और वेद्य में भेद नहीं है वहाँ तक शुद्ध अध्वा कहलाता है। जहाँ से भेद प्रारम्भ होता है वहाँ से लेकर भूमि तक अशुद्ध अध्वा कहलाता है। शिव से लेकर अवरोही क्रम में ३६ तत्त्व इस प्रकार हैं। १. शिवः—यह सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है। यह समष्टि चित् है। चित् ही इसका स्वरूप है। २. शक्तिः—शिव का अभिन्न चिन्मय सामर्थ्य या स्वातंत्र्य। इसमें आनन्द का प्राधान्य है। ये दोनों तत्त्व सभी अभिव्यक्ति के मूल हैं और एक प्रकार से अभिव्यक्ति से परे हैं।