प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context१०८ प्रत्यभिज्ञाहृदय माया के पंच कंचुक (खोल) ७. कला—कर्तृत्व या साधकता का संकोच अथवा परिच्छिन्नत्व । ८. विद्या—ज्ञातृत्व का संकोच अथवा ज्ञान का परिच्छिन्नत्व । ९. राग—तृप्ति का संकोच अथवा परिच्छिन्नत्व जिसके कारण सदा भिन्न भिन्न विषयों की चाह बनी रहती है । १०, काल—नित्यता का संकोच जिसके कारण भूत (अतीत), भवत् (वर्तमान) और भविष्यत् का अलग अलग बोध होता रहता है और जन्म-मरण होता रहता है । ११. नियति—स्वातंत्र्य का संकोच जिसके कारण परिच्छिन्न देश कारण इत्यादि का बोध होता है। नियति ही जीवको कृत्य और अकृत्य में अवश बनाकर उसका नियमन करती रहती है । १२. पुरुष—जब शिव अपनी माया द्वारा आत्मगोपन करके परिमित या परिच्छिन्न प्रमाता बन जाता है, तब उसको पुरुष कहते हैं । प्रमाता वा पुरुष हो जाने पर शिव का सर्वकर्तृत्व कला में अर्थात् किंचित्- कर्तृत्व में परिणत हो जाता है, उसका सर्वज्ञत्व विद्या (परिच्छिन्न ज्ञान) में परिणत हो जाता है; उसका पूर्णत्व राग (भिन्न भिन्न विषय के लिए अभिलाषों) में परिणत हो जाता है; उसका नित्यत्व काल (खण्ड खण्ड समय) में परिणत हो जाता है; उसका व्यापकत्व नियति (परिच्छिन्न देश, कारण इत्यादि) में परिणत हो जाता है । कला से नियति तक माया के पांच कंचुक कहलाते हैं जो कि वे अवगुण्ठन या परदे हैं जिनसे शिव अपने को ढक लेता है । १३. प्रकृतिः—बुद्धि से लेकर पृथिवी तक के प्रादुर्भाव की मूल योनि, प्रमेय का मूल अधिष्ठान । इस दर्शन में प्रत्येक पुरुष के लिए भिन्न भिन्न प्रकृति है । १४. बुद्धि—निश्चयात्मक ज्ञान की शक्ति । १५. अहंकार—अहं + कार अहम् (मैं) भाव को 'कार' करनेवाला या प्रकट करनेवाला तत्त्व । १६. मनस् (मन) संकल्प विकल्प चित्त । १७-२१. पंच ज्ञानेन्द्रिय—पांच प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करनेवाली इन्द्रियां ( श्रवण, स्पर्श, दर्शन, रसन, गन्ध ) । २२-२६. पंच कर्मेन्द्रिया (वचन, ग्रहण, गमन, उत्सर्ग और जनन) ।