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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 16 of 187

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Page 16

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बहुत संक्षिप्त रूप में कुशलता से प्रतिपादन किया गया है। क्षेमराज ने ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही कहा है :- 'इह ये सुकुमारमतयोऽकृततीक्ष्णतर्कशास्त्रपरिश्रमाः शक्तिपातोन्मिषितपा- रमेश्वरसमावेशाभिलाषिणः कतिचित् भक्तिभाजः तेषामीश्वरप्रत्यभिज्ञोप देशतत्त्वं मनाक् उन्मील्यते'। “इस जगत् में कुछ ऐसे भक्त लोग हैं जो सुकुमारबुद्धि के हैं, जिन्होंने कठिन तर्कशास्त्र में परिश्रम नहीं किया है किन्तु जो परमेश्वर के साथ उस समावेश की अभिलाषा करते हैं जो कि शक्तिपात से विकसित होता है, उनके लिए ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में जो उपदेश है उनके तत्त्व को थोड़ा खोला जा रहा है। वह उत्पलाचार्य की 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' को इस दर्शन का एक उत्तम ग्रन्थ मानते थे । जो प्रभु के अनुग्रह से 'प्रत्यभिज्ञा' के मुख्य सिद्धान्तों को जानना चाहते हैं परन्तु जो कठिन तर्क के अभ्यास के न होने के कारण उत्प- लाचार्य के महान् ग्रन्थ को समझने में असमर्थ हैं उनके लिए उन्होंने एक सुखसाध्य और सरल पुस्तक प्रस्तुत की है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' के कठिन तार्किक विवेचन को छोड़कर मुख्य सिद्धान्तों को थोड़े से पृष्ठों में संक्षिप्त करने में उनको अपूर्व सफलता मिली है। जो लोग प्रत्यभिज्ञा के प्रारम्भिक ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक बहुत काम की है। उन्होंने स्वयं सूत्रों का भी ग्रथन किया है और व्याख्या भी लिखी है। 'प्रत्यभिज्ञा' का अर्थ है 'पहचान'। जीव वस्तुतः शिव है, किन्तु वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है और अपने देह और मन से अपना तादात्म्य माने बैठा है। 'प्रत्यभिज्ञा' का उपदेश उसको अपने वास्तविक स्वरूप को समझने में सक्षम बनाने के लिए है, उसको यह सत्य हृदयंगम कराने के लिए है कि उसका वास्तविक स्वरूप शिव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और उसको वह साधना सुझाने के लिए है जिससे उसको शिव में समावेश की प्राप्ति हो जाय। उस उपदेश का विस्तृत वर्णन पुस्तक के भीतर मिलेगा। यहाँ पर हम इस दर्शन के मुख्य मन्तव्यों का निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत सिंहावलोकन करेंगे :- १-परमार्थ या चरम तत्त्व, २-जगत्, ३-स्वातन्त्र्यवाद और आभास- वाद, ४-षडध्वा, ५-शांकर अद्वैतवाद के साथ तुलना, ६-जीव, ७-बन्ध, ८-मोक्ष ।