प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
Page 169 of 187
Read in contextपारिभाषिक शब्दों का कोश १५७ सामरस्य चेतना का एकात्म्य, शिव और शक्ति का तादात्म्य । संकोच सिकुड़न, परिमितता । सांख्य वह दर्शन जो पुरुष और प्रकृति को दो सर्वथा भिन्न मूल तत्त्व मानता है। इस दर्शन का अनुयायी भी सांख्य कहलाता है। सुषुप्ति गाढ़ स्वप्नरहित निद्रा की अवस्था । सृष्टि सर्जन, निस्सरण, निर्गम, प्रकटीकरण । सर्वकर्तृत्त्व सब कुछ करने की शक्ति । सर्वज्ञत्व सब कुछ जानने की शक्ति । स्थिति धारण, रखाव । स्वप्न सपने की अवस्था । स्वरूप अपना वास्तविक रूप, वास्तविक भाव, मूलवस्तु । स्वरूपापत्ति अपने वास्तविक रूप की प्राप्ति । स्वतन्त्र अपनी इच्छानुसार निरपेक्ष अबाधित कर्ता । स्वातन्त्र्य परमशिव का निरपेक्ष अबाधित इच्छानुसार कर्तृत्व । स्वात्मसात्कृ अपने में मिला लेना, अपने में समीकरण कर लेना । स्वेच्छा शिव या शक्ति की अपनी इच्छा, स्वातंत्र्य । ह ह शक्ति का प्रतीक । हठपाक अनुभव का प्रमातृचेतना के साथ सात्मीकरण की निरन्तर आग्रही प्रक्रिया । हेतु कारण हेतुमत् कार्य हृदय केन्द्रीय चेतना, आध्यात्मिक केन्द्र ।