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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 18 of 187

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Page 18

( ८ ) २-जगत् :- परमार्थ रिक्त या अभिव्यक्तिरहित नहीं है । उसकी अनन्त शक्तियां हैं। उसमें भूत, भवत्, भविष्यत् सब कुछ बीज रूपेण विद्यमान है। यदि परमार्थ, चित् संवित् या महेश्वर में प्रव्यक्त या प्रकट होने की क्षमता न होती, तब तो वह चित् या संवित् ही नहीं कहा जा सकता था, तब तो वह जड़ पदार्थ के समान हो जाता "अस्थास्यदेकरूपेण वपुषा चेन्महेश्वरः महेश्वरत्वं संवित्वं तदत्यक्ष्यद् घटादिवत्” ( तंत्र० ३, १०० श्लो० ) “यदि महेश्वर एक रूप में पड़ा रह जाता, यदि वह अनन्त रूपों में प्रकट न होता, तब तो उसका महेश्वरत्व और संवित्व ही समाप्त हो जाता और वह एक जड़ घट के समान हो जाता”। यह ऊपर कहा जा चुका है कि परमशिव "प्रकाश विमर्शमय" है। उस अवस्था में अहं ( मैं ) और इदं ( यह ), शिव और विश्व एक अभिन्न ऐक्य में होते हैं । अहं प्रकाश रूप है और अहं का अहंरूपेण प्रत्यवमर्श ( अनु- चिन्तन ) विमर्श रूप है । यही विमर्श स्वातंत्र्य या अबाधित शक्ति है । पराप्रावेशिका में क्षेमराज ने इसी को परम शिव का हृदय कहा है ( हृदयं परमेशितुः ) । शक्ति शक्तिमान् से भिन्न नहीं है, उसी का प्ररूप है । परम अनुभूति में जो इदं कहा जाता है वह अहं ही है । यह विमर्श या शक्ति शून्य नहीं है । इसमें सब कुछ है । यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं विश्वमेतच्चराचरम् ।। ( पराप्रावेशिका में क्षेम राज द्वारा उद्धृत ) जैसे बरगद का बड़ा वृक्ष अपने बीज में शक्तिरूप में विद्यमान रहता है, उसी प्रकार यह चराचर विश्व शक्तिरूप में महेश्वर के हृदय ( विमर्श ) में विद्यमान रहता है । दूसरा उदाहरण जो प्रायः दिया जाता है वह मयूर (मोर) का है । मयूर जैसे अपने सारे चित्रित पिच्छकलाप सहित मयूराण्डरस में सम्भाव्यता के रूप में विद्यमान है, वैसे ही समस्त विश्व महेश्वर की शक्ति में विद्यमान है । महेश्वर की शक्ति को ही चिति, पराशक्ति या परावाक् कहते हैं ।