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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

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( १० ) अभिन्न हैं। शिवतत्त्व में से शक्ति के व्यापार से इदं प्रत्याहृत हो जाता है, केवल अहं रह जाता है। क्षेमराज ने इस स्थिति को अनाश्रित शिव कहा है। उनके शब्द हैं : श्री परमशिवः ---- पूर्वं चिदैक्याख्यातिमयानाश्रितशिवपर्याय शून्यातिशून्यात्मतया प्रकाशाभेदेन प्रकाशमानतया स्फुरति । इस अवस्था में शिव इदं से रहित केवल अहं के रूप में रहता है। शिव विश्वरूप में भासित हो, इसके लिए 'अहमिदम्' के एकात्म अनुभव में एक व्यवधान आवश्यक हो जाता है। परन्तु यह एक अस्थायी अवस्था है। वेदक से वेद्य पृथक् होकरपुनः अहमिदम्-एकात्मरूप में नहीं, किन्तु अहं इदं इस रूप में प्रकट होता है जिसमें अहं और इदं विविक्त तो हैं, किन्तु विच्छेद्य नहीं हैं क्योंकि वे एक ही आत्मा या चित् के अंग है। शक्ति चित् को अहं और इदं में, वेदक और वेद्य में अभिस्पन्दित कर देती है। शक्ति शिव से भिन्न नहीं है, वह शिव की सर्जनोन्मुखता मात्र है। वह शिव का अहंविमर्श है। जैसा कि महेश्वरानन्द ने अपने महार्थमञ्जरी में कहा है । 'स एक विश्वमेषितुं ज्ञातुं कर्तुं चोन्मुखो भवन् । शक्तिस्वभावः कथितो हृदयत्रिकोणमधुमांसलोल्लासः ( पृ० ४० ) । वही (शिवही) अपने हृदय के इच्छा-ज्ञान-क्रिया रूपी त्रिकोण के माधुर्य से परिवर्धित उल्लास द्वारा अपने में ही स्थित विश्व को ईक्षण करने के लिये उन्मुख होने पर शक्ति स्वभाव वाला कहलाता है । महेश्वरानन्द इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं : यदास्वहृदयवर्तिनमुक्त रूपमर्थतत्त्वं बहिः कर्तुमुन्मुखो भवति तदा शक्तिरिति व्यवह्रियते । ( पृ० ४० )। जब शिव अपने हृदय में (बीजरूपेण) विद्यमान अर्थतत्त्वको बाहर करने के लिए उन्मुख होता है तब वह शक्ति कहलाता है । शक्ति चित् की क्रियाशीलता या गतिशीलता है। विमर्श या उन्मुखता के सदृश विचार छान्दोग्योपनिषत् के निम्नलिखित वाक्य में मिलता है :-