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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

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( १४ ) अर्थ हो जाता है 'केवल यह' 'अन्य सब वस्तुओं से भिन्न एक परिमित वस्तु' । यहीं माया के द्वारा पूर्ण संकोच या परिमितत्व प्रारम्भ हो जाता है । माया आत्मा पर एक आवरण डाल देती है और भेद-बुद्धि उत्पन्न कर देती है । माया के परिणाम पांच कंचुक हैं । संक्षेप में वे इस प्रकार हैं :- १. कला-परमेश्वर का स्वरूप गोपित होने पर, अणु बनने पर, जिसके द्वारा उसका सर्वकर्तृत्व संकुचित होकर किंचित्कर्तृत्व में परिणत हो जाता है उसे 'कला' कहते हैं । २. विद्या-जिसके द्वारा परमेश्वर का सर्वज्ञत्व संकुचित होकर किंचित् ज्ञत्व में परिणत हो जाता है उसे 'विद्या' कहते हैं । ३. राग-जिसके द्वारा परमेश्वर की पूर्णतृप्ति संकुचित होकर यत्किंचित भोगों में आसक्त हो जाती है उसे 'राग' कहते हैं । ४. काल-जिसके द्वारा परमेश्वर का नित्यत्व संकुचित होकर अतीत, वर्तमान, और अनागत में परिच्छिन्न हो जाता है उसे काल कहते हैं । ५. नियति-जिसके द्वारा परमेश्वर का स्वातंत्र्य संकुचित होकर विशिष्ट कार्य के लिए विशिष्ट कारण का नियम धारण करता है और उसका व्यापकत्व संकुचित होकर किसी विशिष्ट देश में परिच्छिन्न हो जाता है उसे नियति कहते हैं । (iii) परिमित व्यक्ति या जीवन के तत्त्व-वेदक-वेद्य १२ पुरुष शिव जब कंचकों सहित माया को स्वीकार कर लेता है तब उसका सार्वभौम ज्ञान और ऐश्वर्य संकुचित हो जाता है और वह पुरुष या एक परिमित व्यक्ति बन जाता है । पुरुष से तात्पर्य केवल मानवीय व्यक्ति से नहीं है, अपितु प्रत्येक संकुचित वेदन-शील प्राणी से है । पुरुष को अणु भी कहते हैं । अणु कोई दैशिक बिन्दु नहीं है । महेश्वर के पूर्णत्व के परिमितत्व के कारण ही कोई जीव अणु कहलाता है । "पूर्णत्वा- भावेन परिमितत्वादणुत्वम् ।" १३ प्रकृति : सद्विद्या की 'अहं च इदं च' की जो अनुभूति है उसमें से अहं अंश की अभिव्यक्ति पुरुष है और इदं अंश की अभिव्यक्ति प्रकृति है । त्रिक के अनुसार प्रकृति या प्रधान कला का वेद्यरूप कार्य है । ( वेद्यमात्रं स्फुटं भिन्नं प्रधानं सूयते कला-तंत्रालोक, आ०६ ) ।