प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context( ४२ ) तीसरा उपाय है बाह्यच्छेद । इसमें प्राण और अपान को हृदय में पहले रोक कर स्वररहित ककार, हकार वर्णों के उच्चारण से उनका निरोध किया जाता है। चौथा उपाय है आद्यन्तकोटिनिभालन । इसका अर्थ है प्राण का आदि अर्थात् हृदय से उठना और अन्त अर्थात् वहां से बाहर १२ अंगुल के अन्तर पर समाप्त होना—इन दोनों के अवधान का अभ्यास । सूत्र १६—समाधि के संस्कार से परिपूर्ण व्युत्थान में बराबर चित् (पार- मार्थिक चेतना) के साथ अपने ऐक्य का चिन्तन करते रहने से शाश्वत समाधि का लाभ होता है । व्युत्थानदशा में भी निमीलन समाधि के द्वारा योगी समस्त विश्व को चित् में निलीन कर लेता है और क्रममुद्रा द्वारा शाश्वत समाधि लाभ करता है। सूत्र २०—क्रममुद्रा सिद्धि के अनन्तर प्रकाश और आनन्द का सार महा- मंत्र का वीर्यरूप पूर्ण अहन्ता में समावेश होने से अपने उस संविद् देवता के समूह पर प्रभुत्व की प्राप्ति होती है जो सारे विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है। यह सब शिव का स्वभाव है । जब क्रममुद्रा सिद्ध हो जाती है तब साधक का पूर्ण अहन्ता में समावेश हो जाता है और वह संविद्देवता के समूह पर प्रभुत्व प्राप्त करलेता है जिससे सारे विश्व की सृष्टि और संहार होता है । पूर्ण अहन्ता प्रकाशानन्दमय है। इसमें समावेश होने पर जीव देह, प्राण, इन्द्रिय इत्यादि को अहं नहीं समझता । अब वह भागवती अन्तर्ज्योति को ही अहं मानता है। यह वास्तविक अहं संविद, सदाशिव और महेश्वर है । सभी वेद्य का अपने भीतर विश्रान्ति वास्तविक अहंभाव है। यही अहं सभी मंत्रों का सार है और परम वीर्यशाली है । यह समष्टि चित् ही है। इस पूर्णाहन्ता के लाभ होने पर उस संवित्देवतासमूह पर प्रभुत्व हो जाता है जिसके द्वारा सृष्टि और संहार होता रहता है ।