प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in contextप्रत्यभिज्ञाहृदय ४६ स्थितस्यैव प्रकटीकरणम् ।-इत्यनेन जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्था- नम् उक्तम् ॥ २ ॥ अथ विश्वस्य स्वरूपं विभागेन प्रतिपादयितुमाह । तन्नाना अनुरूपग्राह्यग्राहकभेदात् ॥ ३ ॥ 'तत्' विश्वं 'नाना'-अनेकप्रकारम् । कथं ? 'अनुरूपाणां'- परस्परोचित्यावस्थितीनां 'ग्राह्याणां ग्राहकाणां' च 'भेदात्'-वैचि- त्र्यात् । तथा च सदाशिवतत्त्वे अहन्ताच्छादित-अस्फुटेदन्तामयं यादृशं परापररूपं विश्वं ग्राह्यं, तादृगेव श्रीसदाशिवभट्टारकाधिष्ठितो मन्त्र- महेश्वराख्यः प्रमातृवर्गः परमेश्वरेच्छावकल्पिततथावस्थानः । ईश्वर- सूत्र में जो उन्मीलन शब्द आया है वह (चिति में पहले से ही अव्यक्त रूप में) जो स्थित है उसको प्रकट या व्यक्त करने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । इस सूत्र से जगत् का (सृष्टि से पूर्व) प्रकाश रूप में ही स्थित रहना बतलाया गया है । अब विश्व का स्वरूप विभाग द्वारा स्पष्ट करने के लिए कहते हैं । सूत्र ३—विश्व (परस्पर) अनुरूप ग्राह्य (प्रमेय) और ग्राहक (प्रमाता) के भेद से नाना प्रकार का है । भाष्य—(सूत्र में जो) 'तत्' (वह) शब्द है, वह विश्व के लिए प्रयुक्त है । जो 'नाना' शब्द है वह 'अनेक प्रकार' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । कैसे ? परस्पर उपयुक्त रूप में स्थित ग्राह्य (प्रमेय) और गाहक (प्रमाता) के भेद अर्थात् वैचित्र्य से । (ग्राह्य और ग्राहक की अनुरूपता निम्नलिखित है) सदाशिवतत्त्व में जिस प्रकार परापर रूप विश्व जो कि 'मैं' के भाव (अहन्ता) से आच्छादित है और जिसमें 'इस' का भाव (इदन्ता) अस्फुट है ग्राह्य (प्रमेय या विषय) है उसी के अनुरूप मंत्रमहेश्वर नाम के (वहाँ) प्रमाता भी हैं जिनके अधिष्ठाता पूज्य सदा शिव हैं और जिनकी उस दशा में स्थिति परमेश्वर की इच्छा से होती है ।