प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in contextप्रत्यभिज्ञाहृदय ७६ ग्रसमानास्ततो वन्दे देव विश्वं भवन्मयम् ॥’ इति ॥ १४ ॥ यदा पुनः करणेश्वरीप्रसरसंकोचं संपाद्य सर्गसंहारक्रमपरिशीलन- युक्तिम् आविशति तदा बललाभे विश्वमात्मसात्करोति ॥ १५ ॥ चितिरेव देहप्राणाद्याच्छादननिमज्जनेन स्वरूपम् उन्मग्नत्वेन स्फा- रयन्ती बलम्; यथोक्तं 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः.........। (अर्थात् सब ज्ञेय को ज्ञान का ही अंश बनाते रहते हैं) इसलिए हे देव मैं आप के रूप वाले विश्व की बन्दना करता हूँ । (शिवस्तो० २०, १७) (भाव यह है कि सभी जीव विषयों का आहार करते रहते हैं। आप विश्व अर्थात् सब कुछ का आहरण कर लेते हैं। इसलिए विश्व आपका स्वरूप ही है) । जब फिर (साधक) इन्द्रिय देवियों के प्रसार का सम्पादन करके क्रम से सर्ग (भावों वा पदार्थों की सृष्टि अर्थात् बहिःस्थापन) के अभ्यास के उपाय का आलम्बन करता है और संकोच का सम्पादन करके (अर्थात् इन्द्रियों को भीतर प्रतिसंहृत करके) संहार (भावों वा पदार्थों वा ज्ञेयों को ज्ञान में परा- वृत्ति या प्रतिसंहृति) के अभ्यास के उपाय का आलम्बन करता है, तब सूत्र १५--चिति (चित् शक्ति) के (स्वभावसिद्ध) बल को प्राप्त करने पर वह (साधक) विश्व को आत्मसात् कर लेता है (अपने स्वरूप में समीकरण कर लेता है) । भाष्य--चिति अर्थात् चित् शक्ति ही का देह, प्राण इत्यादि कोशों को दबाकर अपने उभार से अपने स्वरूप का उन्मेष 'बल' कहलाता है। जैसा कि कहा गया है (स्पन्दकारिका निः २ का० १० में) “तब उस (चिति) के बल को प्राप्त करके मन्त्र१३६ सर्वज्ञ के बल से सम्पन्न हो जाते हैं ई० ।”