प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context८२ प्रत्यभिज्ञाहृदय प्राणान् अपि धारयतो मुक्तिः; प्रत्यभिज्ञातनिजस्वरूपविद्राविताशेष- पाशराशित्वात् । यथोक्तं स्पन्दशास्त्रे 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन्सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥' इति ॥ १६ ॥ अथ कथं चिदानन्दलाभो भवति ?-इत्याह मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः ॥ १७ ॥ सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् तद्भित्तिलग्नतां विना च कस्य- चित् अपि स्वरूपानुपपत्तेः संविदेव भगवती 'मध्यम्' । सा तु माया- दशायां तथाभूतापि स्वरूपं गृहयित्वा 'प्राक् संवित्प्राणे परिणता' इति नीत्या प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादि- करते हुए भी मुक्ति, क्योंकि उस समय अपने स्वरूप की पहिचान के द्वारा सभी बन्धन-समूह छिन्न हो जाता है । जैसा कि स्पन्दशास्त्र (वसुगुप्त की स्पन्द- कारिका नि० २.५) में कहा है "जिसको इस प्रकार का सम्यक् ज्ञान हो जाता है वह सब जगत् को शिव की क्रीड़ा के रूप में देखते हुए उससे (शिव से) युक्त रहने के कारण सदा जीते हुए भी मुक्त है । इसमें सन्देह नहीं ।" तो चिदानन्द का लाभ किस प्रकार होता है ? इसके विषय में सूत्रकार कहते हैं— सूत्र १७—मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है । भाष्य—भगवती संवित् (चित्-शक्ति) ही 'मध्य'१४० है क्योंकि यही सब कुछ के अन्तरतम रूप में विद्यमान है और क्योंकि किसी का भी स्वरूप ही नहीं सम्भव है जब तक कि वह संवित् रूप आश्रय से न लगा हो । उसने (संवित् ने) इस प्रकार होती हुई भी (अर्थात् सब कुछ का अन्तरतम तथ्य और आश्रय होते हुए भी) मायादशा में अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाते हुए 'पहले संवित् प्राण में परिणत हुई' इस नीति के अनुसार प्राणशक्ति१४१ भूमि को स्वीकार करके अवरोह क्रम से बुद्धि देह इत्यादि भूमियों में रहती