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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 97 of 187

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Page 97

प्रत्यभिज्ञाहृदय ५७ 'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विष्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तम्भभूत- स्तिष्ठन्विश्वाधार एकोऽवभासि ।" इति । श्रीभट्टकल्लटेनापि उक्तम् 'रूपादिषु परिणामात् तत्सिद्धिः ।' इति शक्तेश्च संकोचविकासौ, नासापुटस्पन्दक्रमोन्मिषत्सूक्ष्मप्राण- शक्त्या भ्रूभेदेन क्रमासादितोर्ध्वकुण्डलिनीपदे प्रसरविश्रान्तिदशापरि- शीलनम्; अधःकुण्डलिन्यां च षष्ठवक्त्ररूपायां प्रगुणीकृत्य शक्तिं, तन्मूल-तदग्र-तन्मध्यभूमिस्पर्शविशः । यथोक्तं विज्ञानभट्टारके 'बह्नेर्विषस्य मध्ये तु चित्तं सुखमयं क्षिपेत् । कि कक्ष्यास्तोत्र में कहा है—"हे (शिव) दृष्टि इत्यादि सारी शक्तियों को अपनी चेतना द्वारा अपने अपने विषय में एक साथ चारों ओर फेंक कर भीतर सुवर्ण स्तम्भ के समान (अचल रूप से) वर्तमान रहते हुए तुम्हीं एक विश्व के आधार प्रतीत होते हो।" भट्टकल्लट ने भी कहा है—"रूप इत्यादि के रहते हुए भी परिणाम द्वारा (अर्थात् रूप इत्यादि के अनुभव के समय जो चेतना बाहर की ओर जाती हुई प्रतीत होती है उसके विषय में यह बोध बनाये रखना कि यह वही है जो आन्तरिक चेतना है) उसकी (अर्थात् शक्ति विकास की) सिद्धि होती है।" शक्ति का संकोच-विकास इस प्रकार होता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी १५८ में प्रसर (फैलाव) और विश्रान्ति (रुकाव) दशा का (मानसिक) अभ्यास विकास है जो दशा कि सूक्ष्म प्राणशक्ति द्वारा भ्रूभेद से (अर्थात् भौंहों के बीच के प्राण के निरोध से) क्रमशः प्राप्त होती है और जो सूक्ष्मप्राणशक्ति नाक के भीतर के वायुस्पन्दन के नियमन से विकसित होती है और शक्ति का संकोच षष्ठवक्त्ररूपी १५९ (छठें अवयव रूपी) अर्थात् छठें अवयव मेढ्रकन्द में स्थित अधःकुण्डलिनी १६० में, प्राणशक्ति को पुष्टकर, उसके (अधःकुण्डलिनी के) मूल, मध्य और अग्रभाग में समावेश है। जैसा कि आदरणीय विज्ञान भैरव [६८वें श्लोक] में कहा है:—"सुखमय चित्त को 'केवल' रूप में [अर्थात्

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