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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages
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१२६ प्रत्यभिज्ञाहृदय और अभेद का संहार करने में शक्तियों का चक्र काम करता है किन्तु पतिदशा में अभेद की सृष्टि और स्थिति करने में और भेद का संहार करने में—इनका चक्र विगलित हो जाता है और स्वयं शक्तियाँ काम करने लग जाती हैं । ११०. भैरव मुद्रा—इसका लक्षण शास्त्रों में इस प्रकार दिया हुआ है— अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेष-वर्जितः । इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ दृष्टि निमेष (पलकों का बन्द करना) और उन्मेष (पलकों का खोलना) दोनों से वर्जित होकर बाहर की ओर लगी हो और चेतना बाहर की ओर न जाकर भीतर में स्थित आत्मा को अपना लक्ष्य बनाये रहे अर्थात् इन्द्रिय तो बाहर की ओर खुला हो, किन्तु चित्त भीतर की ओर पलटा हुआ हो—यह अवस्था भैरवी मुद्रा की है जो कि सब तंत्रों में गुप्त रखी जाती है । १११. शुद्धविकल्प शक्ति—यह वह विकल्प (विशेष प्रकार की कल्पना) है जिसमें साधक 'शिवोऽहं'—'मैं शिव हूँ' के भाव का अनुभव करता है । यह भी विकल्प है, किन्तु शुद्ध इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें साधक अन्य विकल्पों को छोड़ कर परमात्मा से अपने तादात्म्य के भाव को बनाये रखता है । यह परमात्मा से ऐक्य की चेतना है । इस शुद्ध विकल्प के अभ्यास से साधक निर्विकल्प अवस्था में पहुँच जाता है । शुद्ध विकल्प द्वारा साधक को यह अनुभव होने लगता है कि सारा विश्व मेरा ही (अर्थात् आत्मा का ही) वैभव है । ११२. विकल्प—दे० टि० ४६ ११३. 'महेशता' अथवा माहेश्वर्य वह अवस्था है जिसमें जीवात्मा महेश अथवा परमात्मा के साथ तादात्म्य का अनुभव करता है । ११४. यहाँ पर ग्रन्थकर्ता ने यह बतलाया है कि इस शक्ति का वामेश्वरी क्यों नाम पड़ा । 'वाम' शब्द 'वम्' धातु से सम्बद्ध है जिसका अर्थ होता है वमन करना, बाहर फेंकना । यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए कहलाती है क्योंकि यह विश्व को परम शिव से वाहर फेंकती है । 'वाम' शब्द का अर्थ बायाँ और विपरीत भी है । यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए भी कहलाती है, क्योंकि शिव में अभेद, पूर्णता की चेतना है किन्तु संसारदशा में उसके विपरीत भेद और अपूर्णता की चेतना है और प्रत्येक जीव-शरीर, प्राण इत्यादि को ही 'मैं' समझने लगता है । वामेश्वरी के 'वाम' में यह श्लेष वर्तमान है जो अनुवाद में नहीं व्यक्त किया जा सकता । ११५. खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी, वामेश्वरी शक्ति के ही भिन्न भिन्न प्रकार हैं । खेचरी का सम्बन्ध प्रमाता से है, गोचरी का

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टिप्पणियां १२७ सम्बन्ध अन्तःकरण से है, दिक्‌चरी का सम्बन्ध बहिष्करण (बाह्य इंद्रियों) से है, भूचरी का सम्बन्ध भावों (पदार्थों) से है। ये शक्तिचक्र अपरि- च्छिन्न सत्ता को परिच्छिन्न (परिसिमित) बनाते हैं। खेचरी चक्र के द्वारा चेतन (आत्मा) अपरिमित प्रमाता से परिमित प्रमाता बन जाता है। गोचरी चक्र से वह अन्तःकरण से परिच्छिन्न हो जाता है। दिक्‌चरी चक्र के द्वारा वहबहिष्करणों से परिच्छिन्न हो जाता है। भूचरी चक्र के द्वारा वह भावों (पदार्थों) में ही अटका रह जाता हैं। खेचरी--खे (आकाशे) चरतीति खेचरी। 'ख' शब्द का अर्थ आकाश है। 'खे' सप्तमी विभक्ति है। इसका अर्थ है 'आकाश में'। यहाँ पर 'ख' या आकाश चित् का प्रतीक है। इस शक्ति का नाम खेचरी इसलिए पड़ा है क्योंकि इसका क्षेत्र चिद्‌गगन है। चिद्‌गगन के पारमार्थिक स्वभाव की छिपाकर यह प्रमाता को परिमित बना देती है। वह अब पशु बन जाता है। गोचरी उसे कहते हैं जिसका क्षेत्र अन्तःकरण होता है। संस्कृत का 'गो' शब्द गमन वा चलन का द्योतक है। किरण, गो, इन्द्रिय यह सब 'गो' कह- लाता है क्योंकि इन सब में गमन का भाव निहित है। अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है, वही इन्द्रियों को परिचालित करता है। इसलिए वह गोचरी शक्तिचक्र का क्षेत्र है। दिक्‌चरी वह शक्ति है जो दिक् (दिशाओं) में चलती रहती है। बहिष्करण वा बाह्य इन्द्रियों का सम्बन्ध दिक् का देश से हैं। इसलिए दिक्‌चरी शक्तिचक्र का क्षेत्र बाह्य इन्द्रियाँ हैं। भूचरी में जो 'भू' शब्द है उसका अर्थ है 'होना'। जो कुछ हो गया है वह 'भू' के अन्तर्गत है। अतः यह भाव अर्थात् पदार्थ वा प्रमेयों (विषयों) का द्योतक हैं। सभी पदार्थ वा प्रमेय भूचरी के क्षेत्र हैं। परिमितप्रमाता - उसका अन्तःकरण उसका बहिष्करण और उसके प्रमेय सभी भिन्न शक्तिचक्रों की अभिव्यक्ति हैं। ११६. अन्तःकरण के तीन प्ररूप हैं—बुद्धि, अहंकार और मन। बुद्धि का काम निश्चय करना है, अहंकार का काम अभिमान है जिसके द्वारा जीव शरीर इत्यादि अनात्म पदार्थों से तादात्म्य स्थापित करता है और भोक्ता बनता है और मन का कार्य है पदार्थों का 'यह घट है,' 'यह पट है' इत्यादि प्रकार से, भेद-विकल्प करना। ११७. ऐश्वर्य शक्ति परमेश्वर अर्थात् परमशिव के प्रभुत्व अथवा आधि- पत्य की शक्ति है। यह उसके स्वातंत्र्य शक्ति का ही दूसरा नाम है।

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१२८ प्रत्यभिज्ञाहृदय स्वातन्त्र्य शक्ति का यह भाव है कि परमशिव सब कुछ करने, न करने अथवा अन्य प्रकार से करने में पूर्णतः स्वतंत्र है। उसके अतिरिक्त कोई दूसरी ऐसी शक्ति नहीं जिसके दबाव से वह ऐसा करता हो । ११८-११६. स्फुरत्ता प्रकाश का ही दूसरा नाम है और कर्तृता विमर्श का दूसरा नाम है। प्रकाश और विमर्श को समझने के लिए देखिए टि० २१ । १२०. प्राण, अपान, समान शक्ति-पंचप्राण प्रसिद्ध हैं। वे हैं प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान । ये अधिकतर पाँच वायु के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। इन्हीं पांच प्राणों से जीवों का जीवन चलता रहता है। प्राण शरीर से भिन्न होते हैं। वे शरीर के सारे कार्य चलाते रहते हैं। प्राणों की अभिव्यक्ति वायु के द्वारा होती है। प्राण सामान्य अर्थ में जीवन के कार्य चलाने वाली सभी शक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है। विशेष अर्थ में प्राण वह वायु है जो नथने से बाहर निकलता है जिसे प्रश्वास कहते हैं। अपान वह वायु है जो नीचे गुदा की ओर जाता है और जो मल-मूत्र को बाहर फेंकता है। समान वह वायु है जो शरीर के भीतर कार्य करता हुआ अन्न इत्यादि के पचाने के अनन्तर उनका शरीर में समीकरण करता है। उदान वह वायु है जो ऊपर की ओर जाता है। यहाँ पर प्राण, अपान, समान इत्यादि शक्ति कहे गये हैं। इन्हीं नाम के वायु इन्हीं शक्तियों के कार्य हैं जैसे प्राण वायु प्राणशक्ति का कार्य है इत्यादि । प्राण, अपान, समान शक्तियों से जीव बद्ध होता है, वह पशु बनता है और उदान और व्यान शक्तियों से वह मुक्त हो जाता है, पति बनता है। १२१. पुर्यष्टक-यह सूक्ष्मशरीर का पर्याय है जो कि संस्कारो का कोश है, जो स्थूल शरीर की भांति मृत्यु के समय नष्ट नहीं हो जाता । पुर्यष्टक = पुरी + अष्टक । पुरी का अर्थ है पुर (नगर) । अष्टक का अर्थ है अष्ट (आठ) का समुदाय । पुर्यष्टक का अर्थ हुआ 'आठ के समुदाय वाला पुर' । यह अष्टक या आठ का समुदाय निम्नलिखित है:- ५-तन्मात्राएँ + बुद्धि + मन + अहंकार । १२२ इस सन्दर्भ में कला का अर्थ है, भाग, अंग जो जीव को परिमित और बद्ध बनाते हैं। १२३-जब प्राण और अपान तुल्यबल हो जाते हैं, तब उदान शक्ति का आविर्भाव होता है। तब उदानशक्ति क्रियाशील हो जाती है और मध्यधाम वा सुषुम्ना के भीतर में ऊपर की ओर जाती है और तुर्य अर्थात् चेतना की चौथी अवस्था को प्रकट करती है।

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६ टिप्पणियाँ १२६ १२४. 'मध्यधाम' मध्यवाली नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहते हैं । सुषुम्ना की दोनों ओर नाड़ियाँ हैं जो भौतिक नाड़ियाँ नहीं हैं, किन्तु प्राण की नाड़ियाँ हैं । जिसमें से कुछ प्रवाह होता है वह नाड़ी कहलाता है । सुषुम्ना की दोनों ओर जो नाड़ियाँ हैं वे ईडा और पिंगला कहलाती हैं । ईडा नाड़ी में प्राण का प्रवाह होता है और पिंगला में अपान का । ईडा सुषुम्ना की बाईं ओर है और पिंगला दाहिनी ओर । ईडा को सूर्यनाडी और पिंगला को चन्द्रनाडी भी कहते हैं । सुषुम्ना वह नाड़ी है जो मेरुदण्ड के भीतर से होकर ऊपर मस्तिष्क की ओर जाती है । मनुष्य में सामान्यतः प्राण और अपान शक्तियाँ ही क्रियाशील रहती हैं। जब योग के अभ्यास से प्राण और अपान की धाराएं तुल्यबल हो जाती हैं, तब मध्यधाम अर्थात् सुषुम्ना का मार्ग खुल जाता है और उदान की धारा उसके भीतर से सहस्रार की ओर बहने लगती हैं और तब चेतना की तुर्यअवस्था घटित होती हैं । १२५. तुर्य--तुर्य शब्द का अर्थ है चौथा । चतुर् शब्द का अर्थ होता है चार । तुर्य शब्द 'चतुर् + यत्' से बना है 'चतुर्' के 'च' का लोप हो जाता है, केवल 'तुर्' रह जाता है और यत् प्रत्यय के त् का लोप हो जाता है, केवल 'य' रह जाता है । 'तुर् + य' से 'तुर्य' हो जाता है जिसका अर्थ होता है चौथा । सामान्यतः मनुष्य की चेतना तीन अवस्थाओं में कार्य करती रहती है- जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति ( गाढ़ निद्रा ) । जब मध्य धाम अथवा सुषुम्ना में उदान शक्ति क्रियाशील होती है, तो तुर्य अर्थात् चौथी अवस्था की चेतना की उपलब्धि होती है । इस अवस्था में अभेद बुद्धि होती है, भेदबुद्धि चली जाती है । यह अवस्था आनन्दपूर्ण होती है । प्रथम अर्थात् जाग्रत् अवस्था में, देह, प्राण मन और इन्द्रियां क्रियाशील रहती हैं । द्वितीय अर्थात् स्वप्न की अवस्था में केवल प्राण और मन क्रियाशील रहते हैं। तृतीय अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में मन भी निष्क्रिय हो जाता है और आत्मा अर्थात् शुद्ध चैतन्य को केवल शून्य का बोध रह जाता है । तुर्य अर्थात् चौथी अवस्था में जीव उपर्युक्त अवस्थाओं से छुटकारा पा जाता है और चिदानन्दघन अवस्था में रहता है । हमारी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ परस्पर पृथक् होती हैं अर्थात् जाग्रत् अवस्था में स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था नहीं रहती । स्वप्नावस्था में जाग्रत् और सुषुप्ति की चेतना नहीं रहती, सुषुप्ति अवस्था में जाग्रत् और स्वप्न की चेतना नहीं रहती । जब हम एक अवस्था में रहते हैं, तो हमें अन्य दो अवस्थाओं का बोध नहीं रहता । प्रत्येक अवस्था का बोध पृथक्

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१३० प्रत्यभिज्ञाहृदय पृथक् होता है। इन तीनों अवस्थाओं में हमारी चेतना खण्डशः कार्य करती है। किन्तु जब हमें तुर्यावस्था की उपलब्धि होती है, तो हमें बराबर तीनों अवस्थाओं का बोध रहता है। तुर्य अखण्ड सम्पूर्ण चेतना है, उसे सदा तीनों अवस्थाओं का बोध रहता है। तुर्य अविच्छिन्न चेतना है। जब तुर्य चेतना दृढ़रूप से प्रतिष्ठित हो जाती है, तो मन की खण्डवृत्ति अर्थात् मन का खण्डशः विभागशः जानने का स्वभाव क्षीण हो जाता है। तुर्य चेतना एक ऐसी अवस्था है जिसके द्वारा हमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का सदा बोध रहता है। माया के कारण हममें भेदबुद्धि रहती है। तुर्य अर्थात् चौथा एक सापेक्ष शब्द है। यह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं की अपेक्षा से तुर्य वा तुरीय (चौथा) कहा जाता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ विलुप्त नहीं हो जातीं। केवल यह होता है कि तुर्य-अवस्था को उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं का सदा बोध रहता है। वह उपर्युक्त तीन अवस्थाओं से छिन्न नहीं रहती। तुर्य अवस्था उदानशक्ति के द्वारा सम्पन्न होती है। १२६. व्यानशक्ति—समष्टि की दृष्टि से यह विश्व भर में व्याप्त है; व्यष्टि की दृष्टि से कुण्डलिनी के जाग्रत् होने पर यह सारे शरीर में व्याप्त हो जाती है और इसके द्वारा तुर्यातीत अवस्था सम्पन्न होती है। १२७—तुर्यातीत दशा:—इसका अर्थ है 'तुर्य अर्थात् चौथे से अतीत'। यह तुर्य से परे की अवस्था है। तुर्य (चौथा) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति— इन तीन अवस्थाओं की अपेक्षा से तुर्य कहलाता है। तुर्यातीत दशा में उपर्युक्त तीन अवस्थाओं का विलोप हो जाता है। इसलिए जब तीन अव- स्थाओं का विलोप हो जाता है, तब तुर्य जो उन तीनों की अपेक्षा से तुर्य कहलाता था फिर तुर्य नहीं कहा जा सकता। तब वह अवस्था तुर्यातीत कहलाती है अर्थात् वह अवस्था जिसमें तुर्य अतीत हो गया है, चला गया है, समाप्त हो गया है। तुर्यातीत दशा में चेतना निस्तरङ्ग महोदधि के समान हो जाती है और आनन्द से परिपूर्ण होती है। यह शिव-चेतना है। यह वह अवस्था है जिसमें समस्त विश्व का अपने आत्मा जैसे भान होता है। तुर्य दशा में मन केवल क्षीण हो जाता है, तुर्यातीय दशा में वह शक्ति में विलीन हो जाता है। जब तुर्य अवस्था पूर्णरूप से विकसित होकर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब वह तुर्यातीत में परिणत हो जाती है। इस अवस्था में व्यक्ति को सब कुछ शिव या आत्मा जैसा प्रतीत होता है। १२८. पतिदशा—यह वह दशा है जिसमें जीव का पति अर्थात् शिव से तादात्म्य हो जाता है।

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टिप्पणियाँ १३१ १२६. ६ वें विद्वत् सूत्र में संसारित्व का वर्णन परमशिव के दृष्टिकोण से किया गया है। उसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार परमशिव अपने स्वातन्त्र्य से अपनी इच्छा ज्ञान-क्रिया शक्तियों का संकोच करके संसारित्व सम्पादित करता है। इस १२वें सूत्र में संसारित्व का वर्णन जीव के दृष्टिकोण से किया गया है। इसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार जीव पशुदशा में अपने ही शक्तिचक्रों से व्यामोहित होकर संसारित्व को प्राप्त होता है और किस प्रकार पतिदशा में उदानशक्ति से तुर्यावस्था और व्यानशक्ति से तुर्यातीत अवस्था में पहुँच जाता है। जीव पशुदशा में शक्तिचक्रों से व्यामोहित होकर संसारी बनता है, पतिदशा में शक्ति के विकास से जीवन्मुक्ति लाभ करता है। १३०. यहाँ यह नहीं बतलाया गया हे कि ग्रन्थकार प्रत्यभिज्ञा की किस टीका का संकेत कर रहा है। सम्भवतः उत्पलाचार्य ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका पर जो विवृति लिखी थी और जो अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है उसी का संकेत ग्रन्थकार ने किया है। १३१. चित्त--जीव की संकुचित संवित् । १३२. चेतन-इस शब्द का इस प्रसंग में अर्थ है आत्मा की तात्विक संवित् । १३३. चिति-संवित् का असंकुचित वास्तविक स्वरूप। इसे चित् भी कहते हैं। चित् की शक्ति को प्रायः 'चिति' कहते हैं। १३४. उत्पलदेव या उत्पलाचार्य का काल ६००-६५० ईसवी शती है। यह उद्धरण शिवस्तोत्रावली से किया गया है। १३५. परम्परागत त्रिमूर्ति है-ब्रह्मा, विष्णु, शिव। इस शास्त्र में शिव चरम सत् के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसलिए इसमें शिव के स्थान में इन्द्र शब्द का प्रयोग हुआ है। १३६. यह उद्धरण वसुगुप्त की स्पन्दकारिका का है। पूरी कारिका इस प्रकार है :- तदाक्रम्यबलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्त्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ (स्प० २ का १०) अर्थात् मन्त्र (चिति) के उस बल को प्राप्त कर सर्वज्ञ (शिव) के बल से सम्पन्न हो जाते हैं और तब अपने अधिकृत कार्य में प्रवृत्त होते हैं जैसे देही (व्यक्ति) की इन्द्रियाँ (देही की शक्ति से अपने अधिकृत कार्य में प्रवृत्त होती हैं, केवल अपने से ही नहीं)। १३७. समावेश समाधि की वह अवस्था है, जिसमें एकत्व का बोध होता है, जिसमें समस्त विश्व का आत्मवत् बोध होता है, जिसमें जीव की चेतना शिव की चेतना से तादात्म्य लाभ करती है।

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१३२ प्रत्यभिज्ञाहृदय १३८. व्युत्थानदशा-व्युत्थान का शाब्दिक अर्थ है 'उठना'। व्युत्थानदशा का अर्थ है समाधिदशा से चित्त का साधारण दैनिक जीवन की दशामें आ जाना । १३६. देहप्राणनीलसुखादिषु-'देहप्राण' प्रमाता का सूचक है। इसमें सापेक्ष बुद्धि से देह बाह्य है और प्राण आन्तर, 'नीलसुखादि' प्रमेय का सूचक है। इसमें 'नील' बाह्यप्रमेय ओर 'सुख' आन्तर प्रमेय का सूचक है। १४०. मध्य-मध्यनाड़ी; 'मध्य' शाम्भव दृष्टि से सर्वव्यापी चित् है जो कि सबके भीतर की मध्यभूत सत्ता है। वह शिव की विशुद्ध अहंता (अहं-चेतना) है। 'शक्ति' की दृष्टि से वह ज्ञान-क्रिया है। 'अणु' (जीव) की दृष्टि से वह मध्य नाड़ी है। मध्यनाड़ी अथवा मध्यमानाड़ी सुषुम्ना नाड़ी है जो ईडा और पिंगला के बीच की नाड़ी है। 'नाडी' शब्द नड धातु से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ गिरना या बहना है। जिसमें से कुछ गिरे या बहे वह नाडी है। नाडी वह नली है जिसमें से प्राण का प्रवाह होता रहता है। सुषुम्ना नाडी का मध्य वा मध्यमानाडी नाम इसलिए है क्योंकि वह शरीर के मध्य में है। 'सुषुम्ना' शब्द की व्युत्पत्ति सन्दिग्ध है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार इसकी व्युत्पत्ति है 'सुषु इत्यव्यक्तशब्दं मनति' (सुषु+√म्ना) अर्थात् जो 'सुषु' यह अव्यक्त ध्वनि करती रहती है, वह सुषुम्ना है। कुछ लोगों ने नाडी को 'नर्व' (वायुनाडी) और चक्रों को 'गैंग्लिया' (नाडी ग्रन्थि) समझ रखा है। यह भ्रम है। योग की नाडी और चक्र स्थूल शरीर के अङ्ग नहीं हैं। वे सूक्ष्म शरीर में प्राणमयकोश के अंग हैं। केवल उनका संस्पर्श और प्रभाव स्थूल शरीर के 'नर्व' (नाडी) और 'गैंग्लिया' (नाडीग्रन्थियों) के द्वारा व्यक्त होता है। चक्र प्राणशक्ति के अधिष्ठान हैं। १४१. प्राणशक्ति का इस सन्दर्भ में तात्पर्य सर्वव्यापी आद्या प्राणशक्ति से है, न कि व्यक्ति के भीतर जो प्राणवायु है। चिति का आत्मस्वरूप को गोपन करने के लिये और धीरे धीरे पञ्चमहाभूत में परिणत हो जाने में यह पहला क्रम है। इस प्राणशक्ति को महाप्राण भी कहते हैं। १४२ ब्रह्मरन्ध्र-तंत्रशास्त्र के अनुसार प्राणमय कोश में कई चक्र अवस्थित हैं जो कि प्राण के भिन्न भिन्न केन्द्र हैं। ये चक्र इसलिए कहलाते हैं क्योंकि इनकी आकृति चक्र (चाक) जैसी प्रतीत होती है। इनके भीतर प्राण पुञ्जीभूत रहता है और प्राणमयकोश के माध्यम से उस प्राण का वितरण सारे स्थूल शरीर को होता है।

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टिप्पणियां १३३ जब ऊपर के चक्र जाग्रत् हो जाते हैं तब साधक को कुछ सूक्ष्म और गुह्य अनुभव होते हैं । उनके नाम स्थूल शरीर के सबसे निकट के अवयवों के साथ नीचे दिये हैं । संस्था | सबसे निकट का स्थूलशरीर का अवयव | चक्र १. जननेन्द्रिय के नीचे मेरु दण्ड का प्रदेश मूलाधार २. जननेन्द्रिय के ऊपर ,, ,, स्वाधिष्ठान ३. नाभि का ,, ,, मणिपूर ४. हृदय का ,, ,, अनाहत ५. कण्ठ के नीचे का ,, ,, विशुद्ध ६. भ्रूमध्य का ,, ,, आज्ञा ७. सिर का ऊपरी भाग ,, ,, सहस्रार अथवा ब्रह्मरन्ध्र । १४३. अधोवक्त्र–इसका शब्दार्थ है नीचे का अवयव । इसको मेढ्रकन्द भी कहते हैं । यह गुदा के मूल में है । १४४. पलाशपत्र–ढाक के पत्ते को पलाशपत्र कहते हैं । पलाशपत्र की मध्य शाखा का तात्पर्य है 'मध्यतन्तु' । सुषुम्ना की पलाशपत्र के मध्यतन्तु से उपमा दी गई है । जो नाड़ियाँ सुषुम्ना से शरीर में चारों ओर जाती हैं, उनकी उपमा पलाशपत्र के मध्यतन्तु में जुड़ी हुई अन्य तन्तुओं से दी गई हैं जो कि उस पत्र के चारों ओर फैली हुई हैं । १४५. मध्यम नाड़ी—सुषुम्ना है जो कि मेरुदण्ड के भीतर से होती हुई मस्तिष्क तक जाती है । यह मूलाधार से सहस्रार तक प्रसृत है । सुषुम्ना आग के समान चमकती हुई तामसिक नाडी है । इसके भीतर दीप्तिमती वज्रा या वज्रिणी नाडी है जो राजसिक है । इस वज्रिणी नाडी के भीतर पीतवर्ण की चित्रा या चित्रिणी नाडी है जो सात्त्विक है । इसी चित्रिणी नाडी के भीतरी भाग को ब्रह्मनाडी कहते हैं । तंत्रों ने सुषुम्ना को 'वह्नि- स्वरूपा' ( आग के समान ) वज्रिणी को सूर्यस्वरूपा ( सूर्य के समान ) चित्रिणी को चन्द्रस्वरूपा ( चन्द्र के समान ) बतलाया है । चित्रिणी नाडी जहाँ समाप्त होती है वहाँ जो छिद्र है वह ब्रह्मद्वार कहलाता है । इसी द्वार के भीतर से कुण्डलिनी शक्ति ऊपर को जाती है । ईडा और पिंगला नाडियाँ सुषुम्ना के बाहर हैं जो कि समानान्तर रूप में उसके ऊपर से जाती है । बाईं ओर ईडा है और दाहिनी ओर पिंगला ।

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१३४ प्रत्यभिज्ञाहृदय ये नाडियाँ धनुषाकारवत् टेढ़ी हैं। ये नासारन्ध्र पर्यन्त तक गई हैं। मेरु- दण्ड के मध्य में सुषुम्ना है। उसके बाहर बाईं ओर ईडा है और दाहिनी ओर पिंगला इन तीनों का आज्ञा चक्र के पास संयोग होता है जो कि त्रिवेणी कहलाता है। १४६. यह विकास शाम्भवोपाय और शाक्तोपाय की दृष्टि से होता है। १४७. ब्रह्मनाडी—यह मध्यनाडी या सुषुम्ना का ही दूसरा नाम है। १४८. यदामध्यभूता ब्रह्मनाडी विकसति—यह विकास आणवोपाय की दृष्टि से होता हैं। १४६. प्राणायाम का अर्थ है प्राण का आयाम। आयाम का भाव है नियमन अर्थात् नियमित करने की क्रिया। प्राण-अपान, श्वास-प्रश्वास को एक विशेष नियम से लेने और छोड़ने की क्रिया को प्राणायाम कहते हैं। १५०. मुद्रा—इसका साधारण अर्थ है 'छाप, मोहर'। योग में इसका अर्थ होता है विशेष अंग-विन्यास, (विशेष रूप से हाथ और अँगुलियों की निश्चित स्थिति)। अधिक व्यापक रूप में इसका अर्थ होता है कुछ अवयवों और इंद्रियों का विशेष-नियंत्रण जिससे ध्यान और समाधि में सहायता मिलती है, जैसे भैरवी मुद्रा। देखिए घेरण्डसंहिता-तृतीयोपदेश। १५१. बन्ध—इसका शाब्दिक अर्थ है 'बाँधना'। इस सन्दर्भ में इसका अर्थ है योग की वह क्रिया जिसमें किसी विशेष अवयव या अंग को आकुंचित करके रोके रखते हैं। १५२. हृदय—इसका अर्थ यहाँ पर वह हृदय या मासपिण्ड नहीं है जिसके द्वारा सारे शरीर में रक्त प्रसारित होता है। यहाँ पर हृदय का भाव है 'अन्तस्तम चेतना'। इसको हृदय इसलिए कहा है क्योंकि यह समस्त सत्ता का केन्द्र है। यह वह प्रकाश है जिसमें सारा विश्व निहित है। व्यक्ति में यह आध्यात्मिक केन्द्र है। १५३. विकल्प—दे० टि० ४६। १५४. तुर्य—दे० टि० १२५। १५५. तुर्यातीत—दे० टि० १२७। १५६. यहाँ पर क्षेमराज ने भूल की है। कठोपनिषद्—अथर्ववेद की नहीं है, यजुर्वेद की है। अश्नन् के स्थान पर प्रायः इच्छन् पाठ मिलता है। १५७ स्वसंवित्ति अथवा आत्मचेतना की दो स्थिति होती है -(१) शान्तोदित (२) नित्योदित। (१) शान्तोदित वह स्थिति है जिसमें आत्म- चेतना का आविर्भाव होता है, किन्तु फिर तिरोभाव हो जाता है। (२)

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टिप्पणियां १३५ नित्योदित में आत्मचेतना का सदा आविर्भाव बना रहता है, कभी तिरो- भाव नहीं होता । आत्मा तो नित्योदित है ही, उसमें हमारी चेतना की स्थिति बराबर नहीं रहती । शक्तिसंकोच के सिद्ध होने पर हमारी चेतना की नित्योदित में स्थिति हो जाती है । १५८. ऊर्ध्वकुण्डलिनी—जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं और कुण्डलिनी ऊपर को उठती है तो उसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहते हैं । कुण्ड- लिनी एक विशेष शक्ति है जो मूलाधार में ३½ वलयों (लपेटों) में प्रसुप्तरूप से वर्तमान है । जब वह मंत्र अथवा ध्यान के द्वारा जाग्रत् होती है, १ ३/४ वलयों से सुषुम्नानाड़ी के भीतर से ऊपर की ओर उठती है, लम्बिका को पारकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है, तो वह ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहलाती है और उसकी इस व्याप्ति को विकास या विष कहते हैं । जिह्वामूल के पास चार प्राण नाड़ियों के चतुष्पथ ( चौराहा ) को लम्बिका कहते हैं । दो नाड़ियां वे हैं जिनके द्वारा सभी जीवों में प्राण का प्रवाह होता है । तीसरी नाडी वह है जिसके द्वारा योगी मूलाधार से ऊर्ध्वकुण्डलिनी के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र तक जाता है जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है। चौथी नाडी उन सिद्ध योगियों के लिए हैं जिनका प्राण-वायु बिना मूलाधार से होकर सीधे ब्रह्मरन्ध्र को चला जाता है । १५६. षष्ठवक्त्र—यहाँ वक्त्र का अर्थ अवयव है आँख, कान, नाक, मुख और पायु को पंचवक्त्र कहते हैं । मेढ्रकन्द को जो गुदा के मूल में है षष्ठवक्त्र ( छठाँ अवयव ) कहते है । १६०. अधः कुण्डलिनी—लम्बिका से मूलाधार में वर्तमान कुण्डलिनी के १ ३/४ वलय तक का क्षेत्र अधः कुण्डलिनी का है । प्राण का प्रवाह अधः कुण्डलिनी के द्वारा लम्बिका से मूलाधार की ओर होता है । इस दशा को संकोच या वह्नि कहते हैं । प्राण और अपान का मिलकर सुषुम्नाधाम के द्वारा मूलाधार तक आ जाने का नाम अधः कुण्डलिनी है । १६१. वह्नि-विष—वह्नि का अधःकुण्डलिनी से संबंध हैं और विष का ऊर्ध्वकुण्डलिनी से । अधः कुण्डलिनी में प्रवेश ( आवेश ) संकोच अथवा वह्नि कहलाता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी में उठना विकास अथवा विष कहलता है । वह्नि का प्राण वायु से सम्बन्ध है और विष का अपान वायु से । जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और अधःकुण्डलिनी अथवा मूलाधार तक जाता है तब इस दशा को वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मूल और आधे मध्य तक में प्रवेश वह्नि अथवा संकोच कहलाता है । वह्नि शब्द वह धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है ‘ले चलना, ले जाना’ । अग्नि को वह्नि इसलिए कहते हैं क्योंकि वह जो कुछ उसमें हवन किया जाता है उसे देवों त कले

४. चतुर्थ भाग (सूत्र १७-२०): शिव-समापत्ति, चिदानन्द-लाभ एवं ग्रन्थ-उपसंहार

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१३६ प्रत्यभिज्ञाहृदय जाती है। इस दशा में प्राण का मूलाधार तक वहन होता है (अर्थात् जाता है)। इसलिए उसे वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और उसके पूर्ण अग्रभाग से लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी तक में आवेश अथवा प्रवेश विष कहलाता है। इस प्रसंग में विष शब्द का अर्थ जहर नहीं है। विष शब्द विष् धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है 'व्याप्त होना, फैल जाना'। अतः विष का अर्थ है प्रसर या विकास। जहर को विष इसलिए कहते हैं क्योंकि वह सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है। 'वह्नि और विष के मध्य में चित्त को फेंकना चाहिए'-यह कहने का तात्पर्य यही है कि जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं तब चित्त को वह्नि और विष के बीच में अर्थात् अधः कुण्ड- लिनी और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध कर देना चाहिए। निरुद्ध कर देने का तात्पर्य यह है कि वहीं उसे रोक देना चाहिए। १६२. स्मरानन्द—इस प्रकार जब चित्त अधः और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध किया जाता है तब मैथुन के आनन्द की अनुभूति होती है। यह परावृत्त कामानन्द है। मैथुन का संगम बाह्य है, यह संगम आन्तरिक है। १६३. इस स्थान पर इस सम्प्रदाय की यौगिक क्रिया का वर्णन है। मध्य के विकास से ही सिद्धि होती है। अणु अर्थात् जीव के लिए इसका अर्थ है सुषुम्ना में जो कि ईडा और पिंगला नाड़ियों के मध्य में है—प्राणशक्ति का विकास। मध्य की सिद्धि का एक उपाय है शक्ति का संकोच और विकास। संकोच और विकास के शाब्दिक अर्थ से इस यौगिक क्रिया का भाव नहीं व्यक्त हो सकता। यहां पर संकोच का निम्नलिखित तात्पर्य है : जब इन्द्रियों के द्वारा चित्त विषयों की ओर उन्मुख होता है, जब इन्द्रियां रूप, शब्द, गन्ध इत्यादि के ग्रहण में लगी होती हैं, तब चित्त को उनकी ओर से खींच कर भीतर की ओर उस आत्मतत्त्व की ओर लगा देना चाहिए जो कि सभी कार्यों का उद्भव और अधिष्ठान है। विकास का अर्थ है इन्द्रियों के बाहर खुले रहने पर भी भीतर की ओर लक्ष्य रखना अर्थात् भैरवी मुद्रा का अभ्यास। संकोच का भाव है बाह्य विषयों से प्रत्याहार। विकास का भाव इन्द्रियों के विषयों के प्रति उन्मुख रहने पर भी आन्तरिक चेतना पर ध्यान। संकोच और विकास का और अधिक संवर्धन किया जाता है ऊर्ध्वकुण्डलिनी के स्तर पर प्रसर-विश्रान्ति द्वारा। इस सन्दर्भ में प्रसर को विकास का और विश्रान्ति को संकोच का पर्याय समझना चाहिए। योगी सुषुम्ना में प्राणशक्ति का विकास करता है और भ्रूमध्य में उसका निरोध कर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के

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टिप्पणियाँ १३७ स्तर पर पहुँचता है। यहाँ वह प्रसर-विश्रान्ति का अभ्यास करता है। संकोच- विकास का संवर्धन अधःकुण्डलिनी में भी करना पड़ता है। अधःकुण्डलिनी के मूल और मध्य के अर्धभाग में अनुप्रवेश संकोच अथवा वह्नि कहलाता है और अधःकुण्डलिनी के शेष अर्धभाग और अग्रभाग में वहाँ तक अनुप्रवेश जहां कि ऊर्ध्वकुण्डलिनी का पर्यवसान होता है विकास अथवा विष अथवा उन्मीलन समाधि कहलाता है। १६४. अनच्क—अच् = अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ = अर्थात् सभी स्वर। अनच्क का तात्पर्य है ककार, हकार इत्यादि का बिना स्वर के उच्चारण करना (क् ह्)। अनच्क उच्चारण का मुख्य भाव है किसी मंत्र पर ध्यान करते हुए उसके उद्गम तक पहुँच जाना जहाँ वह उच्चारणरहित है। १६५. प्राण हृदय से प्रारम्भ होता है और द्वादशान्त पर समाप्त होता है अर्थात् हृदय से बारह अंगुल के अन्त पर समाप्त होता है। हृदय से यहाँ तात्पर्य है 'उरः प्राचीर (डायफ्राम) का मध्य बिन्दु'। निभालन का तात्पर्य है चित्त का हृदय से प्राण के प्रारम्भ होने और द्वादशान्त पर समाप्त होने पर और अपान के द्वादशान्त पर प्रारम्भ होने और हृदय पर समाप्त होने पर लगाना। प्राण के उठने और ठहरने पर और इसी प्रकार अपान के उठने और ठहरने पर चित्त को लगाये रखना निभालन कहलाता है। यह बौद्धयोग के प्राणापान-स्मृति (पानापानसति) के समान है। यह 'शक्ति-द्वादशान्त या कौण्डली' कहलाता है। एक दूसरा द्वादशान्त ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर है जिसे 'शिव-द्वादशान्त या प्रक्रियान्त' कहते हैं। १६६. सुभगे (सुन्दरि) यह देवी को सम्बोधन करके कहा गया हैं। इस दर्शन में बहुत सी रहस्य की बातें शिव और देवी के संवाद के रूप में कही गयी है। १६७. उन्मेष का शब्दार्थ है खिलना, विकास। यह शैवागमयोग का एक पारिभाषिक शब्द है। इस ग्रन्थ में उन्मेषसम्बन्धी श्लोक की केवल एक पंक्ति दी हुई है। पूरा श्लोक इस प्रकार है :— एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ इसका अर्थ निम्नलिखित है। जब कोई एक विचार में लगा हुआ है और दूसरे विचार का उदय होता है तब दोनों विचारों के सन्धिविन्दु के संवेदन को उन्मेष समझना चाहिए। इसको कोई स्वयं देख ले अर्थात् अनुभव कर ले।

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१३८ प्रत्यभिज्ञाहृदय चित्त का स्वभाव है एक विचार से दूसरे विचार की ओर क्रम से चलते रहना, किन्तु यदि कोई एक विचार के समाप्त होते ही और दूसरे विचार के उदय होने के ठीक पूर्व चित्तवृत्ति को विश्रान्त कर ले, तो वह उन्मेष भाव को प्राप्त कर सकता है। इसका भाव है दो विचारों या विकल्पों के बीच में जो संविद का स्पन्द है उसमें विश्रान्त होना अर्थात् दोनों विचारों का जो आधार या अधिष्ठान है उसमें ठहर जाना । उन्मेष की यह व्याख्या शाक्तोपाय दृष्टि से है। शाम्भवोपाय की दृष्टि से अपने अभीष्ट ध्येय पर ध्याने करते करते पारमार्थिक भाव का उदय होना 'उन्मेष' कहलाता है। १६८. इन श्लोकों में, रसानुभूति पर ध्यान करने के द्वारा परमानन्द के स्वरूप की अनुभूति के लिए तीन उपाय बतलाते गये हैं। (१) आस्वादधारणा : खान-पान के आस्वाद के मूल पर ध्यान करना । (२) शब्दधारणा-संगीत से प्राप्त आनन्द के मूल पर ध्यान करना । (३) मनस्तुष्टिधारणा—जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता होती है उसके मूल पर ध्यान करना । १६६. समावेश को समझने के लिए अभिनवगुप्त के तंत्रालोक के प्रथम आह्निक के २०५ पृष्ठ को देखें । वह इस प्रकार है :— आवेशश्चास्वतन्त्रस्य, स्वतद्रूपनिमज्जनात् । परतद्रूपता शम्भो- राद्याच्छक्त्यविभागिनः ( १.१७३ ) “आवेश ( समावेश ) का अर्थ है स्वातंत्र्यरहित परमित प्रमाता का अपने संकुचित रूप को डुबोकर अर्थात् नगण्य बनाकर स्वतंत्र चैतन्य अर्थात् परमशिव के साथ तादात्म्य कर लेना जो कि आद्या शक्ति से अभिन्न है। समावेश का भाव है अपने संकुचित रूप को विगलित कर परम शिव के रूप को ग्रहण कर लेना जो कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप है । १७०. निमीलन समाधि—यह आँख मूंद कर ध्यान करने पर आन्तरिक समाधि की वह दशा है जिसमें व्यक्तिगत चेतना (चित्त ) सर्वव्यापी चेतना (चित्) में विलीन कर दी जाती है। इसमें वेद्य या ज्ञेय नहीं रह जाता । उसका चित् के साथ ऐक्य हो जाता है। यह वास्तविक अन्तर्मुखता है और पूर्णाहन्ता की अनुभूति का मार्ग है । १७१. व्युत्थान—इसका शब्दार्थ है उठना । योग में इसका अर्थ है ध्यान के अनन्तर सामान्य चेतना की स्थिति में आना ।

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देखिए टिप्पणी सं. १७४ अभिनवगुप्त के अनुसार कला और भुवनों का रेखाचित्र KALĀS AND BHUVANAS ACCORDING TO ABHINAVA-GUPTA 5. ŚĀNTĀTĪTĀ 4. ŚĀNTĀ KALĀ 3. VIDYĀ KALĀ 2. PRATIṢṬHĀ KALĀ

  1. NIVṚTTI KALĀ / १. निवृत्ति कला २. प्रतिष्ठा कला ३. विद्या कला ४. शान्ता कला ५. शान्तातीता EXPLANATORY NOTE ON THE DIAGRAM रेखाचित्र का स्पष्टीकरण समस्त विश्व पाँच कलाओं में विभक्त है । १. निवृत्ति कला — यह निम्नतम कला है। यह मुख्यतः पृथ्वीतत्त्व की बनी हुई है। इसके अन्तर्गत १६ भुवन हैं। निवृत्तिकला का निम्नतम भुवन 'कालाग्निरुद्र भुवन' कहलाता है। इसी का क्षेमराज ने 'कालाग्न्यादेः' में उल्लेख किया है। २. प्रतिष्ठा कला—निवृत्तिकला के बाद यह दूसरी कला है। इसमें जल तत्त्व से लेकर प्रकृतितत्त्व तक २३ तत्त्व हैं और ५६ भुवन हैं। ३. विद्या कला—यह तीसरी कला है। इसमें पुरुषतत्त्व से लेकर मायातत्त्व तक सात तत्त्व हैं और २८ भुवन हैं। ४. शान्ता कला—यह चौथी कला है। इसमें तीन तत्त्व हैं—शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव, और १८ भुवन हैं। ५. शान्तातीता कला—यह पाँचवीं कला है। इसमें केवल शिव और शक्ति तत्त्व हैं और कोई भुवन नहीं है। परमशिव तो सब कलाओं से अतीत है। भुवनों की कुल संख्या १६ + ५६ + २८ + १८ = ११८ है।
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टिप्पणियाँ १३६ १७२. क्रममुद्रा—इसकी दूसरी संज्ञा मुद्राक्रम भी है। इसका भाव ग्रन्थ में ही क्रमसूत्र में बतला दिया गया है। इसमें चित्त क्रम से बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की ओर झूलता रहता हैं। ‘आभ्यन्तर’ सर्वव्यापी चेतना या शिव प्रतीत होता रहता है और ‘बाह्य’ भी इस दशा में एक भिन्न जगत् नहीं किन्तु सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है। इस सन्दर्भ में ‘मुद्रा’ शब्द अवयवों और अंगुलियों के एक विशेष विन्यास या संस्थान के अर्थ में नहीं प्रयुक्त हुआ है। जिस अर्थ में उसका यहाँ प्रयोग हुआ है वह ग्रंथ में ही आगे दिया हुआ है। १७३. पराभट्टारिका रूपा अहन्ता। यह पूर्ण अहन्ता है। परा अहन्ता कहने का तात्पर्य है परमोत्कृष्ट विमर्श। विमर्श अर्थात् अहंबोध तीन प्रकार का है—पर, अपर और परापर। पर विमर्श शिव का है जिसमें पूर्ण अभेद है, मैं और यह, ज्ञाता और ज्ञेय में कोई भेद नहीं है। अपर विमर्श अणु (जीव, व्यक्ति) का है जिसमें ‘मैं’ और ‘यह’ में ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ में सर्वथा भेद है। परापर विमर्श शक्ति का है जिसमें भेदाभेद है अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद होने पर भी उसका अतिक्रमण होता रहता है। १७४. ‘कालाग्न्यादेः चरमकलापर्यन्तस्य’—निवृत्तिकला के अन्तर्गत काला- ग्निभुवनेश से लेकर अन्तिम कला तक। निवृत्तिकला सृष्टि की निम्नतम कला है। शान्ताकलासृष्टि की उच्चतम कला है। यहाँ पर ‘कला’ का अर्थ है ‘सृष्टि का भाग’। सृष्टि की कलाओं को समझने के लिए संलग्न रेखाचित्र देखिए। १७५. संविद्देवताचक्रम्—संविद्देवतासमूह। समष्टि की दृष्टि से खेचरीचक्र, गोचरीचक्र, दिक्‌चरीचक्र और भूचरीचक्र संविद्देवता हैं। व्यष्टि की दृष्टि से परिमित प्रमाता, अन्तःकरण, बहिष्करण ओर प्रमेय संविद्देवता हैं। १७६ चमत्कार—सृष्टि क्रिया के अद्भुत आनन्द को चमत्कार कहते हैं। यहाँ पर इसका भाव है ‘अहंविमर्श’—पूर्णाहन्ता का आनन्द, समस्त सृष्टि को अहंभाव से समझने का आनन्द। यह अहंविमर्श प्रकाश के साथ एकसद्- भाव का परिणाम है। ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ के विषय में देखिए टि० २१। परमसत् प्रकाश—विमर्शमय है। वह व्यक्त और अव्यक्त रूप में विश्व भी है और उसका शाश्वत अधिष्ठान भी है। १७७ प्रकाश के साथ एक सद्भाव—क्षेमराज ने यहाँ पर सत् का आरो- हणक्रम से वर्णन किया है। पहली अवस्था है—सवेद्य वा प्रमेय—जो कुछ भी ज्ञेय वस्तु है। दूसरी अवस्था है संवेदन वा प्रमाण अर्थात् ज्ञान। तीसरी अवस्था है—सदाशिव जिसकी चेतना शरीर इत्यादि परिच्छिन्न उपाधियों से एकीकृत नहीं रहती, प्रत्युत समस्त विश्व ही जिसका शरीर है। चरम

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१४० प्रत्यभिज्ञाहृदय अवस्था है महेश्वर जिसकी आत्मसंवित्ति में समस्त सृष्टि समाविष्ट है और जिसका प्रकाश से एक सद्भाव है। १७८ आदिक्षान्तामायीयशब्दराशिपरमर्श—'अ' लेकर 'क्ष' तक अमा- यीय शब्द राशि की स्मृति के कारण—तंत्र के अनुसार पराशक्ति (चरम ईश्वरीय सर्जनात्मक शक्ति जिसके द्वारा विश्व का आविर्भाव होता है) और परावाक् (चरम ईश्वरीय शब्द जो समस्त शब्दराशि का उत्स हैं) एक ही है। प्रत्येक पद वाचक कहलाता है और प्रत्येक अर्थवाच्य कहलाता है। वाच्य वा अर्थ ईश्वरीय शब्द का आशय मात्र है, वह केवल ईश्वरीय शब्द का दृश्य रूप है। ईश्वरीय शब्द अमायीय है अर्थात् माया के क्षेत्र से परे है। शब्द दो प्रकार के हैं—मायीय (माया के क्षेत्र के) और अमायीय (माया के क्षेत्र से परे)। मायीय शब्द वे हैं जिनका अर्थ लौकिक परिपाटी के अनुसार आरोपित होता है। वे विकल्प मात्र हैं। अमायीय शब्द वे हैं जो निर्विकल्प हैं जिनका अर्थ सत्य है, जो कल्पना, आरोपण अथवा रूढ़ि के परिणाम नहीं हैं, जो चिन्मय हैं। परामर्श—जो कुछ वाच्य-वाचक जगत् है वह अमायीय शब्दराशि के रूप में महेश्वर में वर्तमान है। सृष्टि महेश्वर की अपनी शब्दराशि की स्मृति मात्र है, और कुछ नहीं। १७६, जगदानन्द—जगत् रूपी आनन्द। जगदानन्द इस दर्शन का एक पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में फूट निकलता है। इस दर्शन में जगत महेश्वर के आनन्द की च्युति नहीं है, प्रत्युत जगत् उसके आनन्द की अभिव्यक्ति है। जगत् उसके आनन्द का दृश्य रूप है। अभिनव गुप्त के जादानन्द के विषय में निम्नलिखित श्लोक हैं:— यत्रकोऽपि व्यदच्छेदोनास्तियद्विश्वतः स्फुरत् यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्तिभावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शंभुरुक्तवान् ॥ (तंत्रः खं० ३, ५ आ० ५०-५१) सब ओर से प्रकाशमान होने के कारण जिसमें कोई विभाग नहीं है, जिसमें चेतना अक्षुण्ण और अविकल है अर्थात् जिसमें चेतना ही अपने को प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के रूप में अभिव्यक्त कर रही है, जो महेश्वर के आनन्दरूपी अमृत से प्रसारित है जिसमें ध्यान इत्यादि की कोई आवश्यकता ही नहीं है वही जगदानन्द है—ऐसा मुझको शम्भु ने बतलाया है। (शम्भु अभिनवगुप्त के गुरु का नाम है जिन्होंने उनको त्रिकदर्शन सिखलाया था)।

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टिप्पणियाँ १४१ जयरथ ने जगदानन्द के भाव को अपनी व्याख्या में इस प्रकार व्यक्त किया है :- जगता निजानन्दाद्यात्मना विश्वेन रूपेणानन्दो यत्र यतश्चेति जगदानन्द- शब्दवाच्यम् । “महेश्वर का अपना आनन्द जगत् के रूप में सब ओर से दृश्यमान होना जगदानन्द है”। १८०. अकुल—“कुलं शक्तिरितिप्रोक्तं, अकुलं शिव उच्यते”। (स्वच्छन्द तंत्र) आगम में शक्ति को 'कुल' कहते हैं और शिव को 'अकुल'। कुल अर्थात् समस्त जगत् शक्ति है। जो जगत् मात्र में लुप्त नहीं है, जगत् मात्र में खो नहीं गया है, वह 'अकुल' अर्थात् शिव है। 'अ' अक्षर मातृकाचक्र की दृष्टि से 'अनुत्तर' या 'अकुल' का द्योतक है। १८१. प्रत्याहार—यहाँ पर प्रत्याहार शब्द संस्कृत व्याकरण के एक पारि- भाषिक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सूत्र अथवा सूत्रों के पहले अक्षर और अंतिम अक्षर को मिलाकर जो एक शब्द बनता है उसे प्रत्याहार कहते हैं। उदा- हरणार्थ अइउण्, ऋऌक्, एओ०, ऐऔच् सूत्रों का पहला अक्षर 'अ' है और अन्तिम अक्षर 'च्' है; इन दोनों को मिलाकर अच् प्रत्याहार बनता है। अच् कहने से अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, और औ इन अक्षरों का बोध होता है। प्रत्येक सूत्र का अन्तिम हलन्त अक्षर केवल प्रत्याहार बनाने के लिए है। वह किसी अक्षर का द्योतक नहीं है। इस प्रसङ्ग में पहले अक्षर 'अ' और अन्तिम अक्षर 'ह' को मिलाने से 'अह्' प्रत्याहार बनता है जो कि संस्कृत के 'अहं' शब्द का सूचक है जिसका अर्थ होता हैं 'मैं, आत्मा'। 'अह्' प्रत्याहार के भीतर अ से ह तक संस्कृत भाषा का प्रत्येक अक्षर समाविष्ट है। आगमकी दृष्टि से प्रत्येक अक्षर वाचक है जो एक वाच्य को सूचित करता है अर्थात् प्रत्येक अक्षर एक पदार्थ का द्योतक है अतः 'अह्' प्रत्याहार में सभी अक्षर आ जाते हैं, अतः 'अह्' वा 'अहं' विश्व के सभी पदार्थों का सूचक है। परम शिव की 'अह' (मैं) की अनुभूति में समस्त विश्व अव्याकृत अभिन्न रूप में निहित है। १८६. बिन्दु—बिन्दु का अर्थ है बिन्दी, नुकता। अनुत्तर अर्थात् परमशिव के प्रशान्त महासागर में क्षोभ का, तनाव का एक कण उठता है। यह बिन्दु है। इसमें भावी विश्व अव्यक्त रूप से निहित रहता है। इस बिन्दु को 'घनीभूता शक्ति' कहते हैं। यह अभी पदार्थों में व्यक्त नहीं हुई है। यह चिद्घन है, घनीभूतसंवित् है जिसमें भावी समस्त विश्व और प्राणी सम्भाव्यरूप में, अविशिष्ट रूप में, अव्याकृतरूप में

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१४२ प्रत्यभिज्ञाहृदय निहित हैं। इसलिए व्याख्याकार क्षेमराज ने लिखा है कि 'अ' और 'ह' सम्पु- टीभूत रूप में समस्त सम्भाव्य विश्व को संगृहीत किये हुए अनुत्तर में, परम- शिव में, एक अविशिष्ट बिन्दु के रूप में पड़ा रहता है। बिन्दु अविशेष का, अभेद का द्योतक है। (संस्कृत) भाषा में बिन्दु अनुस्वार के द्वारा अक्षर के ऊपर एक बिन्दी रखकर व्यक्त किया जाता है। जैसा कि कहा जा चुका है, 'अ' और 'ह' में समस्त विश्व संगृहीत है। 'अ' और 'ह' के अविभाग को व्यक्त करने के लिए उस पर अनुस्वार का बिन्दु रखा हुआ है और इस प्रकार 'अह' 'अहं' के रूप में वर्तमान रहता है। यह अहं परमशिव का विमर्श है जो इस बात का द्योतक है कि समस्त विश्व बीज रूपेण शिव में निहित है और उससे अभिन्न है। 'अ' शिव का प्रतीक है, 'ह' शक्ति का प्रतीक है, उसपर जो अनुस्वार बिन्दु है, वह इस बात का द्योतक है कि यद्यपि शिव अपनी शक्ति के द्वारा पृथ्वी तक में व्यक्त है, वह इस व्यक्तीकरण से विभक्त नहीं हो जाता, वह स्वरूपतः अविभक्त, पूर्ण रहता है। इसी बात को क्षेमराज ने 'अविभागवेदनात्मक बिन्दुरूपतया' इन शब्दों में स्पष्ट किया है। १८३. प्रकाशस्य-मूल में जो 'प्रकाशस्य' शब्द है, उसका यहाँ पर अर्थ है 'घटसुखादिवेद्यप्रकाशस्य' घट (वाह्य) और सुख (आन्तरिक) जो कुछ भी वेद्य रूपी प्रकाश है उसकी (विश्रान्ति)। १८४. महाह्रद-महासरोवर। परम अहंविमर्श अथवा परम आध्यात्मिक आत्मचेतना को 'महाह्रद' कहा है। इसको 'महा' इसलिए कहा है क्योंकि यह अतिगंभीर है, स्वच्छ है और अपरिच्छिन्न है। १८५. 'सम्बन्ध स्थापित करने का भाव है' 'परमशिव के अहंविमर्श से तादात्म्य स्थापित करना।' १८६. 'विवरणकार' से कल्लटाचार्य का निर्देश किया है जो वसुगुप्त के शिष्य थे और जिन्होंने 'स्पन्दकारिका' पर एक वृत्ति लिखी थी। कल्लट ईसवी ६वीं शती में हुए थे। १८७. संवित्तिदेवताचक्र-जब इन्द्रियाँ पूर्ण रूपेण पवित्र होकर देवतातुल्य हो जाती हैं तब उनके चक्र (समूह) को 'सांवित्तिदेवताचक्र' कहते हैं। १८८. 'चक्रवर्ती' शब्द में श्लेष है। एक अर्थ है चक्र (इन्द्रियसम्मूह) का शासक। दूसरा अर्थ है 'सार्वभौम सम्राट्'।

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पारिभाषिक शब्दों का कोश अ अ अनुत्तर, शिव अकुल शिव, जो कुल अर्थात् शक्ति नहीं है, शिव है। अख्याति अज्ञान अधःकुण्डलिनी लम्बिका से लेकर मूलाधार के ३ १/२ वलय तक कुण्डलिनी का क्षेत्र (दे० टि० १६०) अधोवक्त्र गुदा के मूल में स्थित मेढ्रकन्द अनचक शब्दार्थ-व्यञ्जन का बिना स्वर के उच्चारण, गूढार्थ-किसी मंत्र की मानस अवस्था पर ध्यान जहाँ उसका उच्चारण नही होता। अनन्तभट्टारक मंत्रप्रमाताओं का अधिष्ठाता। अन्तकोटि अन्तिम स्थल; हृदय से बारह अंगुलियों के अन्तर का स्थल जिसे द्वादशान्त कहते हैं। अन्तर्मुखी भाव चित्त का भीतर की ओर मुड़ना, प्रत्यग्वृत्ति। अनाश्रितशिव शिव की वह अवस्था जिसमें कोई ग्राह्य नहीं है, जिसके सम्मुख केवल शून्य है, विश्व प्रति- षिद्ध हो गया है। अनुग्रह दैवीकृपा अनुत्तर जिससे बढ़कर और कोई नहीं है, परम असीमसत्, परमार्थ। अपर निम्न अपवर्ग मोक्ष अपान बाहर से भीतर की ओर, गुदा की ओर चलनेवासी वायु। अमायीय माया के प्रभाव से परे; अमायीय शब्द वह है जिसमें पद और अर्थ एकात्म होते हैं। अर्थ उद्देश्य; लक्ष्य; इन्द्रियों का विषय। अलंग्रास ग्राह्य को पूरी तौर से निगल जाना अर्थात् उसको इस प्रकार आत्मसात् कर लेना कि वह आत्मचेतना से भिन्न न जान पड़े।